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गांव का वो कुआं

Mritunjay Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज एक भाई ने एक छवि भेजी!
        
                                                    
                            
उसपर कुछ लिखने को।।।
गांव का वो कुआं।
जो अब मृत प्राय सा हो गया है।
जो बधार में,उसराह पर था,
आज मृतप्राय सा है!
जो जोड़ता दो गांव की सीमाओं को।
उस रास्ते के प्यासे पथिकों को।
उस पीपल की छांव को,
जो आज भी खड़ा ।
उस मृत प्राय कुंए के पास,
अपनी उन यादों के साथ।
जो अतीत बन चुकी है,
पीपल के लिए,कुऐं के लिए
वो आरि आज भी जिन्दा है।
आज भी राही गुजरतें हैं।।
वो उदास पड़ी मड़ई ,
याद करती है अपनी बिरासत को।
वो मृतप्राय सा कुआं !!
उन पुरखों की ये परम निशानी,
काश फिर से अपने रूप में आ जाए।
फिर वहीं चौपाल लगेगी,
मड़ई तब फिर से सजेगी।
आरि के आरिक को,
पानी फिर मिल जाएगा।
रौनक फिर उस वृक्ष की रहेगी
जिसकी छांव में राही,विश्राम कर।
आगे फिर बढ़ जाते थे।
शाखाओं पर कलरव करते,
पक्षी खुब चहचहाते थे।
गांव का वो उदास पड़ा वो कुआं.....
- मृत्युंजय 
एक वर्ष पहले
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