आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

गांव का वो कुआं

                
                                                         
                            आज एक भाई ने एक छवि भेजी!
                                                                 
                            
उसपर कुछ लिखने को।।।
गांव का वो कुआं।
जो अब मृत प्राय सा हो गया है।
जो बधार में,उसराह पर था,
आज मृतप्राय सा है!
जो जोड़ता दो गांव की सीमाओं को।
उस रास्ते के प्यासे पथिकों को।
उस पीपल की छांव को,
जो आज भी खड़ा ।
उस मृत प्राय कुंए के पास,
अपनी उन यादों के साथ।
जो अतीत बन चुकी है,
पीपल के लिए,कुऐं के लिए
वो आरि आज भी जिन्दा है।
आज भी राही गुजरतें हैं।।
वो उदास पड़ी मड़ई ,
याद करती है अपनी बिरासत को।
वो मृतप्राय सा कुआं !!
उन पुरखों की ये परम निशानी,
काश फिर से अपने रूप में आ जाए।
फिर वहीं चौपाल लगेगी,
मड़ई तब फिर से सजेगी।
आरि के आरिक को,
पानी फिर मिल जाएगा।
रौनक फिर उस वृक्ष की रहेगी
जिसकी छांव में राही,विश्राम कर।
आगे फिर बढ़ जाते थे।
शाखाओं पर कलरव करते,
पक्षी खुब चहचहाते थे।
गांव का वो उदास पड़ा वो कुआं.....
- मृत्युंजय 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर