विज्ञापन

स्वप्न दीर्घा से देखो जरा

mayank vajpeyee

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            स्वप्न दीर्घा से देखो जरा
        
                                                    
                            
सीखो सपनों से जिजीविषा
सत्यापन यथार्थ का किंचित मांगा नहीं
अपितु नित्य नवीन स्वप्न रजनी की पलकों पर धरा
कब आँखों ने सपनों का पुरुषार्थ लिया
क्या निद्रा ने कभी सामर्थ्य तोल कर कुछ रचित किया
आशाओं को यदि कभी ऐसे बाधित किया
ठिठकेंगी आँखें अगर कभी सोने का मन किया
10 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all