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स्वप्न दीर्घा से देखो जरा

                
                                                         
                            स्वप्न दीर्घा से देखो जरा
                                                                 
                            
सीखो सपनों से जिजीविषा
सत्यापन यथार्थ का किंचित मांगा नहीं
अपितु नित्य नवीन स्वप्न रजनी की पलकों पर धरा
कब आँखों ने सपनों का पुरुषार्थ लिया
क्या निद्रा ने कभी सामर्थ्य तोल कर कुछ रचित किया
आशाओं को यदि कभी ऐसे बाधित किया
ठिठकेंगी आँखें अगर कभी सोने का मन किया
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9 घंटे पहले

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