त्रेतायुग में थे श्रीराम,
कलयुग मे भी हैं श्रीराम।
हर मानव में राम समाऐ,
भूले भटकों को राह दिखाए।
मर्यादा नरोत्तम राम,
पतित पावन हैं श्रीराम।
प्रेम की परिभाषा है राम,
मन की अभिलाषा है राम।
जित देखो, उत राम ही राम।
कवि जड़ बुद्धि जनम जनम का,
कृपा करो हे कृपा निधान।
मेरी भक्ति है निष्काम,
मुझको शरण में ले लो राम।