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मैं और मेरी लकीरें...

Manish Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कल तो बड़ी ही अजीब रात हुई,
        
                                                    
                            
लकीरों से बहुत देर मेरी बात हुई।

यकीन नहीं हुआ, लकीरें भी कहीं बोलती हैं,
लकीरों ने ही बताया, वो तो सारे राज़ खोलती हैं।

याद करो जब बचपन में, हाथ उन्हे दिखलाया था,
हमें देखकर ज्ञानी जी ने, क्या तुम्हें बतलाया था।
मुझे देख कर तुम्हें कहा था, धन के योग बहुत ही कम हैं,
उसे देख कर वो बोले थे, आयु भी मद्धम मद्धम है।
तिरछी वाली कुछ छोटी है, नाम नहीं तुम कर पाओगे,
सीधी वाली कुछ मोटी है, आस नहीं कि घर पाओगे।
छोटी वाली कुछ तिरछी है, पत्नी-सुख में कुछ संशय है,
लंबी वाली ये कहती है, भाग्योदय में कुछ भय है।

तुमने जब ये जान लिया था,
सब कुछ सच है मान लिया था।

और भला मैं क्या करता,
जब भाग्य नहीं क्या लड़ता।

इतना तो कर ही सकते थे,
हाथ अपना खुद पढ़ सकते थे।
हम चीख-चीख चिल्लाती थीं,
एक गूढ़ राज़ बतलाती थीं।

ऐसा क्या जो कोई ना जाना,
ऐसा क्या जो मैं ना पहचाना।

वो कोने में छोटी सी, एक लकीर देख सकते हो,
वो क्या कहती है सुनो, अगर तुम सुन सकते हो।
वो कहती है तुम अपनी, हर चीज बदल सकते हो,
हाथ बांध कर हाथों की, लकीर बदल सकते हो,
हाथ खोल कर तुम सारी, तस्वीर बदल सकते हो,
हाथ उठा कर जीवन की, तकदीर बदल सकते हो,
हाथ जोड़ कर सपनों की, जागीर बदल सकते हो।

भाग्योदय कैसे होगा, जब कर्मों से भागोगे,
भाग्योदय तो तब होगा, जब सपनों से जागोगे।
कितने वर्षों का जीवन है, कहाँ पता कर सकते हो,
वर्षों में कितना जीवन है, ये खुद तय कर सकते हो।
करो परिश्रम, करो पराक्रम, घर अपना बन जायेगा,
नाम तुम्हारे पीछे चलकर, खुद अपने घर आएगा।
गये नहीं विदेश तो क्या, तुम देश बदल सकते हो,
अपनी किस्मत के तुम सारे, आदेश बदल सकते हो।

आज मांगती सभी लकीरें, इतना तो कर ही सकते हो,
हाथ उठा कर करो प्रतिज्ञा, कोशिश तो कर ही सकते हो।

जो बीत गया सो बीत गया, अब अंजाम बदल सकता हूँ,
हाथ रखा अपने दिल पर, अब कोशिश तो कर ही सकता हूँ।

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