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ख्वाब मेरे

Manish Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कुछ ख़्वाबों ने उम्र भर जीने ना दिया,
        
                                                    
                            
नींद तो बहुत आई पर सोने ना दिया।

भटका तमाम उम्र मगर,
ये ख्वाब मुकम्मल ना हुए,
ख्वाब मेरे कभी पूरे ना हुए

अब ये अधूरे ख्वाब, मेरे ख्वाबों में आते हैं,
मेरे औकात को अब भी आजमाते हैं।

कुछ कोशिशों में कमी थी,
कुछ हालात ऐसे थे,
कुछ तो मुकद्दर की भी बात थी।

वरना लोग तो चांद भी पा लेते हैं,
हमे तो बस सितारे की चाह थी।

जो पूरे हो वो ख्वाब ही कैसे,
जिनकी हसरत बनीं रहे उम्र भर,
कुछ ख्वाब तो हों ऐसे।
3 वर्ष पहले
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