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बिछड़न

Manish Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तेरे लिए मैं गैर सही
        
                                                    
                            
मुझसे तेरा हो वैर सही।

मैं रहा नहीं तेरा अपना
जो बीत गया वो था सपना।

पर मैं कैसे भूलूं वो पल
जब शाम ढले हम मिलते थे
गुलशन में कांटे थे लेकिन
दिल में फूल खिला करते थे

मेरी बातों पर हंसते थे
जज़्बात वो कितने सस्ते थे,
मेरी हर अदा लुभाती थी
मुझे अपना कह के बुलाती थी।
अहसास वो कितने मीठे थे
पर अब लगता है सब झूठे थे।

तुम चतुर चपल कर गये खेल
इस जग में न अपना हुआ मेल।
3 वर्ष पहले
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