कल मेरी कविताओं पर विमर्श करोगे,
मेरी कहानियों को युग का दर्पण कहोगे।
फूल चढ़ाकर मेरी तस्वीर को पूजोगे,
और मेरी ख़ामोशी में अपने पाखंड को छुपाओगे।
पर आज?
जब मेरा रक्त काग़ज़ पर स्याही बनकर बह रहा है,
जब मेरा जीवन भेड़िये के जबड़े में
फँसे हुए मेमने की तरह तड़प रहा है,
तब क्यों मेरी पुकार तुम्हें सुनाई नहीं देती?
तुम जो सभ्यता के शिल्पकार हो,
क्या तुम्हारी संवेदनाएँ सिर्फ़ मृत्यु की दासी हैं?
तुम्हारे समाज की इमारतें
उन मज़दूरों की लाशों पर खड़ी हैं,
जिनकी पीठ से निकली हड्डियाँ
तुम्हारे महलों की नींव बनीं।
तुम जो मेरी कविताओं की जयकार करोगे,
क्या जानते हो
इन शब्दों के पीछे के आँसू?
मैं उस माँ का बेटा हूँ,
जो भूख से दम तोड़ गई
ताकि उसकी रोटी मैं खा सकूँ।
मैं उस मज़दूर का सपना हूँ,
जिसने सपनों की कीमत
अपने टूटे हाथों से चुकाई।
मेरे शब्दों में वेदना की जो आग है,
वह तुम्हारी उपेक्षा के ईंधन से जलती है।
जीते जी पूछ लो,
क्योंकि जब मैं नहीं रहूँगा,
तो तुम्हारे फूलों की सुगंध मेरे घावों को नहीं भर पाएगी।
तुम्हारे गुणगान मेरे अधूरे सपनों का मोल नहीं चुका पाएंगे।
पूछ लो,
क्योंकि तुम्हारा यह समाज
कब्र के बाहर का अंधकार देखना नहीं चाहता।
तुम जो आदर्शवाद का झंडा उठाए खड़े हो,
क्या तुम्हारी आँखें कभी उन बच्चों को देखती हैं,
जो तुम्हारे शहर की रौशनी के नीचे
भूखे सोते हैं?
जीते जी पूछ लो,
मरने के बाद मेरे नाम पर होने वाले आयोजनों का
कोई अर्थ नहीं।
मेरी चिता की आग में
तुम्हारी दया और ढोंग दोनों जल जाएँगे।
तुम्हारी नकली श्रद्धा,
तुम्हारे खोखले आदर्श,
सब कुछ मेरे शव की राख में बदल जाएंगे।
पूछ लो, क्योंकि जिस दिन
तुम्हारा समाज यह समझेगा
कि मरने वालों की पूजा नहीं,
जीने वालों का सम्मान करना चाहिए—
उस दिन ये दुनिया
तुम्हारे जैसे पाखंडियों से
मुक्त हो जाएगी।
-मनीष कुमार