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वतन के वीरों की अमर कहानी

Kailash salvi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इस धरा के हर कण में, शौर्य की गाथाएं हैं बसी,
        
                                                    
                            
वीरों की ललकारों से गूंजती हैं वादियां हंसी।
हर बूँद में लहू का समर्पण, हर सांस में बलिदान है,
वतन की मिट्टी में बसा, अनगिनत अरमान है।

जहां सैनिकों की शहादत ने, धरती को है सजाया,
आज़ादी की राह में, खुद को फांसी पर चढ़ाया।
उनकी मां की आंखों में आंसुओं की लहरें थीं,
फिर भी गर्व से सिर उठाकर, वीर पुत्रों को विदा कीं।

जिस रात वो निकले थे, दिल में चिंगारी जलाए,
कसम उठाई थी उन्होंने, लौटेंगे या लहू बहाए।
सीने में देशप्रेम की आग, हाथों में बंदूक थामी थी,
उनके कदमों की आहट से, सरहद भी थर्राई थी।

वो बर्फीली चोटियों पर, दुश्मन से लड़े जांबाज,
ठंड से कंपकंपाए, फिर भी जलाया विजय का आगाज।
हर गोली जो लगी उन्हें, तिरंगे की लाज थी,
उनकी धड़कनों में बस, वतन की आवाज थी।

मां के आंचल में छुपे थे कभी, आज मौत से खेले,
देश की मिट्टी को बचाने, रणभूमि में वो थे अकेले।
पर आंखों में चमक थी, दिल में उम्मीद थी जलती,
कह गए वो आखिरी सांस में, **"भारत मां, तू अमर है, हर सांस तुझ पर बलि।"**

अब भी गूंजती हैं वो आवाजें, हवा में कहीं दूर,
उन वीरों की शहादत से, देश की मूरत हुई है भरपूर।
झुकने न देंगे इस धरती को, ये प्रण हमारा सदा रहेगा,
हर पीढ़ी को सुनाएंगे, वो अमर बलिदानों का फेरा।

*कवि: कैलाश सालवी
काव्य गोष्ठी मंच राजसमंद
एक वर्ष पहले
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