ना अतीत का पीछा जहाँ
ना भविष्य की चिन्ता जहाँ
वर्तमान बैठा जहाँ
शांत साधु की तरह
ना विरह केवल मिलन
वंदन सच्चिदानंद का
अभिनंदन आनन्द का
ना राग और ना कोई द्वेष
जीत और ना कोई हार विशेष
निर्विकार निस्पृह
आकर्षण ना विरक्ति ही
जागृति एक स्वयं की
भीड़ से विराम है
स्वयं में विश्राम है
स्वर धूमिल होने लगें,
इच्छाएँ शोर करने लगें,
विचार उलझाने लगें,
संसार स्वयं से दूर ले जाने लगे
लौट आना तब अंतर्मन की देहरी पर
-हरिशंकर ‘हरि’