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सागर प्यासा ही रहा

dinesh chauhan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नदिया बहती रह गई ना देखा निज रूप
        
                                                    
                            
सागर प्यासा ही रहा बन करके एक कूप.

घाट अकेले रह गये आये बहुत से लोग
प्रेम अधूरा छोड़ सब , कर गये पूरा भोग.

जीवन बहता जल रहा चातक जैसी प्यास
घाट घाट लड़ता रहा दिखी कहीं ना आस.

तट कदंब के पेड़ सा खड़ा रहा दिन रात
सपने अपने ना हुये सह कर भी आघात.

पत्ता टूट के डाल से पहुँचा लहरों बीच
बहते बहते जा लगा जहाँ जमी थी कीच.


दिनेश चौहान
2 महीने पहले
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