नदिया बहती रह गई ना देखा निज रूप
सागर प्यासा ही रहा बन करके एक कूप.
घाट अकेले रह गये आये बहुत से लोग
प्रेम अधूरा छोड़ सब , कर गये पूरा भोग.
जीवन बहता जल रहा चातक जैसी प्यास
घाट घाट लड़ता रहा दिखी कहीं ना आस.
तट कदंब के पेड़ सा खड़ा रहा दिन रात
सपने अपने ना हुये सह कर भी आघात.
पत्ता टूट के डाल से पहुँचा लहरों बीच
बहते बहते जा लगा जहाँ जमी थी कीच.
दिनेश चौहान
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