ग़ज़ल
नींद भी तन्हा और जख्म भी हरे,
मैं ऐसा शिकार जो शिकारी पे मरे,
आना ही है तो लेकर आना बरछी,
जख्म सूखने का इंतज़ार कौन करे!
तुझे देखने से ही फुर्सत नहीं दिनों रात,
तुझसे मिलने का हर्जाना कौन भरे!
निकाल कर पायल तू दबे पाँव आना,
सबके सोने का इंतज़ार कौन करे !
जब पिलानी ही है तो पिला ना मुझे,
कल की उतरने का इंतज़ार कौन करे !
Dheeraj yadav(dheerajdy)
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