धरा हिली थी , नभ काँपा था
जब रौद्र हुआ था हिंदुस्तान ।
ना रहम, ना चुप्पी,
अब था बस प्रतिशोध का स्वाभिमान ।
वीरों ने धारण किए विजय कवच,
थामी साहस की कृपाण ।
जब भारत ने ठाना तो ,
हर आतंक पर छाई ललकार।
22 अप्रेल की थी वो रात
जब मौत ने खेला था क्रूर उत्पात।
पहलगाम की वादियों में गूंजे थे,
मातम के साज़ ।
26 मुस्कानों को खामोश कर गया,
वो खूनी नासाज़।
पर्यटक थे - ख्वाबों से परिपूर्ण,
जो अब शमशान की खामोशी में कीर्ण।
यह हमला नहीं, भारत की आत्मा पर प्रहार था। जिसका उत्तर अब बस, प्रलय की मारा था ।
छह-सात मई की रात थी, जैसे धधकता अंगार
जब उठा "ऑपरेशन सिंदूर" बना आतंक का संहार।
मकसद था सीधा , नष्ट हो हर अड्डा,
जहाँ पलता हो हिंसा की ,सोच का गड्डा।
मुरिदके, बहावलपुर ,बने निशाने खास,
जहाँ पलते थे आतंक के ,नापाक इतिहास।
लश्कर-ए-तैयबा, जैश की थी शरण वही,
जहाँ साजिशों की आग ,लगी थी कहीं।
2001 की संसद, 2008 की रात,
मुंबई के आँसू अब बन गए ,प्रतिशोध की बात।
सिंह सम जागे थे ,रण के प्रहरी महान,
हर योजना बनी ज्वाला, हर आदेश बना तूफ़ान।
चीन खड़ा सीमा पर, तुर्की साथ,
पश्चिम ने भी फूंका ,डर का शंखपात।
पर भारत का इरादा ,न डिगा, न डोला,
हर कदम पर राष्ट्रवाद ,का दीप था बोला।
मधुबनी की धरती से आई हुंकार,
प्रधानमंत्री ने किया युद्ध का ऐलान
सार्वजनिक, पारदर्शी और स्पष्ट विचार।
जो करेगा वार, पाएगा प्रहार,
शांति प्रिय है भारत,पर सहनशील नहीं हर बार।
नौ ठिकाने हुए राख, कांप उठा सीमा-पार,
पाक ने स्वीकारी पराजय ,गिर पड़े उसके सिपहसालार।
दुनिया ने देखा नया भारत ,तेजस्वी और प्रखर,
अब हर हमला पाएगा उत्तर — अग्निबाण सम प्रहर।
घंटों में दुनिया ने पहचान लिया विचार,
अब “गोली का जवाब” मिलेगा “गोले” से बारम्बार।
ये सिर्फ़ युद्ध नहीं, ये भारत की पुकार है,
हर सिंदूर की रक्षा में ,अब संकल्प अपार है।
ना रुकेगा अब हिंद, ना झुकेगा कहीं,
जो आँख उठाएगा,वो मिटेगा यहीं।
हर दिशा में गूंजेगी ,यह एक ही वाणी
"यह है भारत की अंतिम चेतावनी!"