कभी घोर निराशा कभी प्रतिपल आशा,
प्रासंगिक कितनी ह्रदय की यह भाषा।
जीवन इन दोनों का क्रम है
सरल आज तो कल व्युत्क्रम है।
कभी सूर्य की किरण घनेरी,
अंधकार घन तम की फेरी।
तृप्त कण्ठ फिर घोर पिपासा,
प्रासंगिक कितनी यह भाषा।
शब्द मधुर कटु हृदय हितैषी,
जैसा मन फिर भाषा वैसी।
किंचित निहित न हित हो उसमें,
धार कलुषिता सित हो जिसमें।
आज धूप कल घना कुहासा,
प्रासंगिक कितनी यह भाषा।
घोर प्रलय पल सृजन लिखा है,
मोह विरह शुभ मिलन लिखा है।
चिर का भी अवसान लिखा है,
हर चेहरे पर एक मुस्कान दिखा है।
पुण्य फलों की यही तो है एक अभिलाषा,
प्रासंगिक कितनी है ह्रदय की यह भाषा।