विज्ञापन

ईश्वर के होने और न होने के बीच

chandan kharwar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ईश्वर के होने और न होने के बीच
        
                                                    
                            

कभी किसी ने पूछा
“नास्तिक होकर प्रेम कैसे कर लिया?
जिसे चाहते हो,
उसे माँगोगे किससे?”

मैंने सोचा
शायद प्रेम ही पहला प्रश्न है
जहाँ मनुष्य अपनी तर्क की सीमा देखता है।

मैंने ईश्वर को खोजने के लिए
मंदिरों की ऊँचाइयाँ नहीं नापीं,
मैंने उस शून्य को देखा
जहाँ से यह पूरा ब्रह्मांड
कभी शुरू हुआ होगा।

ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में
एक अद्भुत साहस था—
सृष्टि के आरम्भ पर भी
ऋषि ने निश्चित उत्तर नहीं दिया;
उसने पूछा—
कौन जानता है कि यह सब कैसे हुआ?

यहीं से मेरी नास्तिकता
पहली बार असहज हुई।

फिर उपनिषदों ने कहा
जिसे आँख देख नहीं सकती,
पर जिसके कारण आँख देखती है;
जिसे मन पकड़ नहीं सकता,
पर जिसके कारण मन विचार करता है
उसे ही खोजो।

तो क्या ईश्वर
आकाश में बैठा कोई चेहरा नहीं,
बल्कि वह आधार है
जिस पर “मैं” और “यह संसार”
दोनों अपने होने का दावा करते हैं?

फिर गीता ने
एक और गाँठ बाँध दी—
सब कुछ उसी में पिरोया है,
जैसे मोती किसी अदृश्य धागे में।

पर मेरी बुद्धि ने पूछा—
अगर वही धागा है,
तो टूटे हुए मोती क्यों हैं?
दुःख क्यों है?
अन्याय क्यों है?
और निर्दोष की प्रार्थना
कभी-कभी मौन क्यों लौटाती है?

कर्म का उत्तर मिला—
पर कर्म के पीछे कारण कौन?

प्रकृति का उत्तर मिला—
पर प्रकृति का प्रथम आधार कौन?

और जब हर प्रश्न को
एक अंतिम नाम देकर रोक दिया गया,
मेरे भीतर फिर वही नास्तिक जागा

क्या “ईश्वर” उत्तर है,
या उस प्रश्न को दिया गया
एक सुंदर नाम,
जिसका उत्तर अभी मिला नहीं?

लेकिन फिर एक और प्रश्न आया—

यदि ईश्वर नहीं,
तो यह “कुछ” है ही क्यों?

शून्य के स्थान पर
अस्तित्व क्यों है?

पदार्थ में चेतना
कहाँ से आई?

और वह चेतना
अपने ही अस्तित्व पर
सवाल करने लगी—
यह रहस्य किस किताब में पूरा लिखा है?

शायद इसी मोड़ पर
आस्तिक और नास्तिक
दो अलग किनारे नहीं रहते।

दोनों एक ही अज्ञात
के सामने खड़े होते हैं
एक उसे ईश्वर कहता है,
दूसरा अज्ञात सत्य।

और मैं?

मैं अभी भी बीच में हूँ।

न मुझे अंधविश्वास स्वीकार है,
न अहंकार से इंकार।

मैं भगवान को इसलिए नहीं मानूँगा
कि डरता हूँ—

और इसलिए भी नहीं नकारूँगा
कि अभी समझ नहीं पाया।

क्योंकि सत्य
मेरे विश्वास का मोहताज नहीं।

अगर ईश्वर है—
तो मेरे मानने से पहले भी था।

अगर नहीं है—
तो मेरे न मानने से
अस्तित्व अचानक खाली नहीं हो जाएगा।

इसलिए मेरी आख़िरी दलील
भगवान के पक्ष या विपक्ष में नहीं

सिर्फ़ सत्य के पक्ष में है।

और शायद यही वह जगह है
जहाँ नास्तिकता भी विनम्र हो जाती है,
आस्था भी प्रश्न करना सीखती है

और मनुष्य पहली बार
ईश्वर को नहीं,
अपने अज्ञान को पहचानता है।
10 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all