बिखरती उम्मीदों के साये में
चलती जा रही बस ज़िंदगी
अंजाने रास्तों से अनचाही मंज़िलों
को बढ़ती जा रही बस ज़िंदगी
बिखरती उम्मीदों के साये में...।
है बेख़बर ख़ुद से भी ये
है ना सुध इसे दुनिया जहान की
जाना कहां पाना है क्या
है इन सवालों से अंजान भी
अपनी पहचान अपने वजूद
का मतलब ये हर पल ढूँढती
बिखरती उम्मीदों के साये में...।
हैं सवाल तो कई सामने
पर जवाब ना कहीं एक भी
मजबूर और बेबस सी हो
ये बस आसमां को देखती
सवालों जवाबों के बोझ से
दबती जा रही बस ज़िंदगी
बिखरती उम्मीदों के...।