कोई यक्षिणी या गंधर्व
मेरी आत्मा को
काजू-फल-सा मथकर निचोड़ रहा है,
मेरे अस्तित्व की
हर अंतिम बूँद तक।
इस बेचैन बिस्तर पर
बेबस पड़ा हूँ मैं,
फिर भी उस निचोड़ में
न विराम है,
न कोई शिथिलता।
पुरुष हूँ,
इसलिए रो भी नहीं सकता।
अपने ही आँसू पी-पीकर
मेरा गला सूखता जाता है,
और भीतर का दुःख
बिना आवाज़ के
मुझे ही निगलता जाता है।