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आत्मा को निचोड़ती हुई कोई यक्षिणी

                
                                                         
                            कोई यक्षिणी या गंधर्व
                                                                 
                            
मेरी आत्मा को
काजू-फल-सा मथकर निचोड़ रहा है,
मेरे अस्तित्व की
हर अंतिम बूँद तक।

इस बेचैन बिस्तर पर
बेबस पड़ा हूँ मैं,
फिर भी उस निचोड़ में
न विराम है,
न कोई शिथिलता।

पुरुष हूँ,
इसलिए रो भी नहीं सकता।

अपने ही आँसू पी-पीकर
मेरा गला सूखता जाता है,
और भीतर का दुःख
बिना आवाज़ के
मुझे ही निगलता जाता है।
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10 घंटे पहले

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