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देखो, अंत में क्या ख़ाक बचता है?

Bharti soam

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            टूट चुका है अंग-अंग,
        
                                                    
                            
छूट चुका है हर-संग।
फिर भी अनोखी ज़िद चढ़ी है,
जो हार स्वीकारने को तैयार नहीं।

नमन हो इस ज़िद को,
या निकला जाए इस दर्द से—
कुछ सूझता सा नहीं!

क्योंकि हार मानने को मैं तैयार नहीं अभी,
तो जलते जाना है इस जलन में, इस तप में,
दर्द बड़ा है जी...
देखो, अंत में क्या ख़ाक बचता है?
एक दिन पहले
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