टूट चुका है अंग-अंग,
छूट चुका है हर-संग।
फिर भी अनोखी ज़िद चढ़ी है,
जो हार स्वीकारने को तैयार नहीं।
नमन हो इस ज़िद को,
या निकला जाए इस दर्द से—
कुछ सूझता सा नहीं!
क्योंकि हार मानने को मैं तैयार नहीं अभी,
तो जलते जाना है इस जलन में, इस तप में,
दर्द बड़ा है जी...
देखो, अंत में क्या ख़ाक बचता है?
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