अंगद रावण संमुख आकर,चीख़त भैरव नाद करे है।
वीर भरे दरबार महाभट,बीच खड़े ललकार भरे है।
आस करे सुमिरै रघुनायक, की जय बोलत पैर धरे है।
डोलय पैर नहीं प्रण देख दशानन के दरबार डरे हैं।
~ कवि अवनीश 'सूर्य'
सिवनी, मध्यप्रदेश
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