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कविता की व्यथा

Ashok Srivastava

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उपजी हूं मैं दिल से तेरे
        
                                                    
                            
संतुष्ट बहुत हो मुझे बनाकर
विनय आज करती हूं तुमसे
सुनलो व्यथा हमारी कविवर

कवि तुम्हारे शब्द सुनहरे
शिल्प तुम्हारा भी रुचिकर
अलंकार से रुप निखरता
भरना रस से लगता हितकर

दिल में जो खयाल तुम्हारे
रुह सरीखे मुझमें बिचरे
जब जब तुम संदेश पिरोते
वजूद सार्थक बनकर निखरे

दिल से दिल संवाद प्रयोजन
मुझको भी प्रिय रुप लुभावन
लय में सुंदर शब्द नियोजन
भटके ना रहे दिशा संयोजन

लोगों की आंखों से टपकूं
चेहरे की मुस्कान दिखूं मैं
दिल से दिल संवाद बनूं मैं
रुहों की आवाज़ रहूं मैं

भाव भरे पंखों पर हरदम
चाह रही खुलकर मैं उड़ना
बनना है बेबाक मुझे अब
नहीं किसी बंधन में रहना

दम घुटता भावों का मेरे
अनुशासन बंधन में रहकर
रुह कभी चोटिल हो जाती
नियमों की छेनी से कटकर

अनुशासन की छेनी से तुम
रुप तराशो चाहे जितना
कट जाये यह रुह कहीं ना
ध्यान जरा तुम इतना रखना

नियमों के तुम पालक बनकर
सर्जक से संहारक लगते
मात्रा की इस पैमाईश में
कवि कभी, कभी मापक लगते

बदलो नियम पुराने कविवर
कवि नियम नवीन बनाओ
भाव सहित उद्देश्य परक हो
शिल्पों में सार्थकता लाओ

-अशोक श्रीवास्तव"कुमुद"
राजरुपपुर, इलाहाबाद

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