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कविता की व्यथा

                
                                                         
                            उपजी हूं मैं दिल से तेरे
                                                                 
                            
संतुष्ट बहुत हो मुझे बनाकर
विनय आज करती हूं तुमसे
सुनलो व्यथा हमारी कविवर

कवि तुम्हारे शब्द सुनहरे
शिल्प तुम्हारा भी रुचिकर
अलंकार से रुप निखरता
भरना रस से लगता हितकर

दिल में जो खयाल तुम्हारे
रुह सरीखे मुझमें बिचरे
जब जब तुम संदेश पिरोते
वजूद सार्थक बनकर निखरे

दिल से दिल संवाद प्रयोजन
मुझको भी प्रिय रुप लुभावन
लय में सुंदर शब्द नियोजन
भटके ना रहे दिशा संयोजन

लोगों की आंखों से टपकूं
चेहरे की मुस्कान दिखूं मैं
दिल से दिल संवाद बनूं मैं
रुहों की आवाज़ रहूं मैं

भाव भरे पंखों पर हरदम
चाह रही खुलकर मैं उड़ना
बनना है बेबाक मुझे अब
नहीं किसी बंधन में रहना

दम घुटता भावों का मेरे
अनुशासन बंधन में रहकर
रुह कभी चोटिल हो जाती
नियमों की छेनी से कटकर

अनुशासन की छेनी से तुम
रुप तराशो चाहे जितना
कट जाये यह रुह कहीं ना
ध्यान जरा तुम इतना रखना

नियमों के तुम पालक बनकर
सर्जक से संहारक लगते
मात्रा की इस पैमाईश में
कवि कभी, कभी मापक लगते

बदलो नियम पुराने कविवर
कवि नियम नवीन बनाओ
भाव सहित उद्देश्य परक हो
शिल्पों में सार्थकता लाओ

-अशोक श्रीवास्तव"कुमुद"
राजरुपपुर, इलाहाबाद

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7 वर्ष पहले

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