जलाया गया मेरा आशियाना
कभी पसीने से सींचा था जिसे
अब न छत रहा न दीवारें
सिर्फ सर पर लटकती तलवारें
जलती मशालों के बीच
चीख़ों का शोर गूंजता रहा
जान बचा कहता रहा
भाग, तुझे अंधेरा ही बचाएगा
वरना सुबह तक न जी पाएगा
अपनों ने जब खंजर दागा
खाली हाथ मैं भागा
चेहरे और पांव पर
जली हुई किस्मत की राख को रगड़
निकल पड़ा मैं उस काली रात
मौत का सामान लिए साथ
जंगल नदियां खेत-खलिहान
पार किए बचाकर जान
पेट की आग में जलकर मैं
बेज़ार पैरों से चलकर मैं
आखिरी घेरा तोड़ गया
मुल्क अपना छोड़ गया
पर
तलवार अभी भी टँगी है
किस्मत की तो तंगी है
क्या नाम था मेरा
क्या काम था मेरा
अब कोई फर्क न पड़ता है
सोता हूँ मैं प्लास्टिक की चादर के नीचे
खड़ा रहता हूँ कतार में
बेबस लाचार लोगों केे पीछे
मेरे दिल की हर धड़कन पर
अब किसी औरका अहसान है
माथे की हर लकीर पर
'रिफ्यूजी 'पहचान है।
- अपर्णा गोयल
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