मेरी तन्हाई की ये एक बात अच्छी है
ये मुझसे कभी भी खफ़ा नहीं होती
उन तमाम दिलकश क़ुर्बतों की तरह
ये मुझसे कभी भी जुदा नहीं होती
जब कभी देखती है मुझको जुदा सबसे
आकर चुपचाप मेरे पास बैठ जाती है
फिर कोई गीत वो जुदाई के
बड़े सुकून से मेरे कान में सुनाती है
जो बात मैने कभी किसी से कही ही नहीं
जो ख़्वाब मैंने बताए नहीं किसी को कभी
वो अश्क़ जिनको किसी ने कभी नहीं देखा
वो दर्द जिसकी ख़बर नहीं सबको
वो सब मेरी तन्हाई जानती है
मुझसे बेहतर ये मुझे पहचानती है
ये मेरी तन्हाई ही है जिसने मुझे ज़िंदा रखा
लिखने के इस फन को इसी ने है ज़िंदा रखा
ये न होती तो ये ग़ज़लें, ये नज़्में कहां से आतीं
मेरे दिल की ये दबी हसरतें कहां से आतीं
कहां से आते ये शेर, ये मज़ामीन ध्यान में
ये तो तन्हाई है, जिसने घेरा है मुझे ऐसे गुमान में
कि मैं लिखता हूं फिर, जब ख़ुद से गुफ्तगू करूँ
अनहोनें ख्वाबों की जब चुपके से आरज़ू करूं
[मज़ामीन: (मज़मून का बहुवचन) यह किसी खास विषय पर लिखी गई रचना]
हर एक चीज़ जिनको मैं महसूस करके लिखता हूं
उन्हें महसूस बस इस लिए कर पाता हूं कि तन्हाई है
माना कि ये फ़न है ग़ज़लगोई का
पर इसके पीछे की ताक़त मेरी तन्हाई है
तन्हाई में तसव्वुर उभर के आते हैं
तन्हाई में फिर लफ़्ज़ गुनगुनाते हैं
मेरी तन्हाई मेरे ख़यालों में रंग भरती है
जब कभी भी वो बात मेरे संग करती है
हूं नहीं मैं तन्हा कि जब तक है ये साथ मेरे
मेरी तन्हाई हर वक्त थामे रहती है हाथ मेरे।
-अनमोल