ओ रे लम्हे...
ओ रे लम्हे...
तू कहीं मत जा,
हो सके तो—
उम्र भर थम जा।
आज न जाने क्यों
हवा में कुछ मिठास-सी है,
इन आँखों में जैसे
कोई प्यारी-सी आस-सी है।
लबों पर सजी ये मुस्कान
यूँ ही सजी रहने दे,
दिल में जो मीठी-सी धुन है,
आज मुझे उसे कहने दे।
ओ रे लम्हे...
तू कहीं मत जा,
हो सके तो—
उम्र भर थम जा।
आज अपनों के बीच बैठा हूँ,
तो लगता है—
जैसे वक्त भी अपना है।
इन रिश्तों की गर्माहट में
हर दुख कहीं खो गया है।
माँ की ममता-सी नरमी है,
बचपन जैसी हँसी है,
कुछ अपने हैं पास मेरे,
बस इतनी ही तो खुशी है।
न सूरज जल्दी ढले आज,
न शाम कहीं से आए,
न इन हँसते चेहरों पर
वक्त की परछाईं छाए।
जो पल मिला है आज हमें,
उसे जी भरकर जी लेने दे,
कल की चिंता कल पर छोड़,
आज को आज ही रहने दे।
ओ रे लम्हे...
तू कहीं मत जा,
इन धड़कनों में
थोड़ा और ठहर जा।
कौन जाने कल क्या होगा,
कौन यहाँ, कौन कहाँ होगा?
किसके हिस्से धूप आएगी,
किसके हिस्से छाँव होगा?
जो आज मिला है,
शायद फिर कभी न मिले,
जो हाथ अभी हाथ में है,
शायद फिर यूँ साथ न मिले।
इसलिए ऐ वक्त...
आज ज़रा ठहर जा,
इन पलों को
अपनी बाँहों में भर जा।
अगर तेरा चलना ही नियति है,
तो आज कुछ धीमे चलना,
इन आँखों में बसे सपनों को
कुछ देर और पलने देना।
फिर जाना...
जहाँ जाना हो जाना,
मगर आज की इस शाम को
यादों में हमेशा के लिए बस जाना।
ओ रे लम्हे...
तू कहीं मत जा...
इन हँसी के पलों को
यूँ ही गुजरने मत दे,
दिल ने जो पाया है आज,
उसे बिखरने मत दे।
हो सके तो...
उम्र भर थम जा।
और अगर ठहरना
तेरी फितरत में नहीं—
तो इतना कर...
जब भी याद आए
आज की ये शाम,
मेरे चेहरे की ये मुस्कान,
अपनों का ये साथ...
तो लौट आना—
बस एक पल के लिए।
ओ रे लम्हे...
तू कहीं मत जा...
हो सके तो—
उम्र भर थम जा...
उम्र भर थम जा...
उम्र भर...
थम जा।
- अनिता चतुर्वेदी 'मनस्वरा'