ज़हर में घुली है, हवा की रवानी।
ठहर सी गई है यहां ज़िन्दगानी।
कोई अपने घर से निकलता नहीं है।
हुई मुद्दतें कोई मिलता नहीं है।
हुए क़ैद बचपन, बुढ़ापा, जवानी।
ठहर सी गई है यहां ज़िन्दगानी।।
ख़ुदा जाने कैसा ये बरपा कहर है।
जिधर देखिए बस कोरोना का डर है।
बुरा वक़्त है पर ना करना नादानी।
ठहर सी गई है यहां ज़िन्दगानी।।
न टी०वी० शहीदों की गाथा सुनाती।
ख़बर हर जगह से कोरोना की आती।
नये हादसों को सुनाती ज़ुबानी।
ठहर सी गई है यहां ज़िन्दगानी।।
हुआ कुछ बुरा तो, कुछ अच्छा हुआ है।
दिखा साफ़ अम्बर, धुंआ कुछ छटा है।
हुआ साफ़ झीलों औ नदियों का पानी।
ठहर सी गई है यहां ज़िन्दगानी।
दिनों बाद संग सबके खाई है रोटी।
सुनी बातें सबकी, बड़ी हों या छोटी।
ठहाकों भरी शाम लगती सुहानी।
ठहर सी गई है यहां ज़िन्दगानी।।
दिनों बाद अम्मा के संग बैठा बेटा।
न मिलती थी फ़ुर्सत, थका रहता बेटा।
सुनी अपने बचपन की फिर से कहानी।
ठहर सी गई है मगर ज़िन्दगानी।।
दिनों बाद बच्चों के संग पापा खेले।
बड़े काम थे और बहुत थे झमेले।
हैं फ़ुर्सत के पल और बातें सुहानी।
ठहर सी गई है यहां ज़िन्दगानी।।
"अणिमा सिंह" मम्फोर्डगंज प्रयागराज
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