तुम बिन कौन सहाई हरि जी।
मतलब की जगत मिताई हरि जी।?
कंचन-कामिनी मोह न छोड़े।
मन की अलग ढिंठाई हरि जी।।
खेल लड़कपन प्यार में यौवन।
वृद्धापन आँसू ढरकाई हरि जी।।
काया-कंचन साँसन रतन-धन।
सबने दिया गँवाई हरि जी।।
जब-जब कष्ट कलुस मन घेरे।
आवें याद पिताजी-माई हरि जी।।
कपटी मन की गति हरि जानो
देना पार लगाई हरि जी।।
मीत बने के अनिल हैं अगणित।
बिगड़े नहिं भाई-भउजाई हरि जी।।
-पंडित अनिल