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हरि जी

                
                                                         
                            तुम बिन कौन सहाई हरि जी।
                                                                 
                            
मतलब की जगत मिताई हरि जी।?

कंचन-कामिनी मोह न छोड़े।
मन की अलग ढिंठाई हरि जी।।

खेल लड़कपन प्यार में यौवन।
वृद्धापन आँसू ढरकाई हरि जी।।

काया-कंचन साँसन रतन-धन।
सबने दिया गँवाई हरि जी।।

जब-जब कष्ट कलुस मन घेरे।
आवें याद पिताजी-माई हरि जी।।

कपटी मन की गति हरि जानो
देना पार लगाई हरि जी।।

मीत बने के अनिल हैं अगणित।
बिगड़े नहिं भाई-भउजाई हरि जी।।
-पंडित अनिल
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2 महीने पहले

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