प्रेम के नाम कई है
पर प्रेम का रूप तीन ही है
एक प्रेम जो तन से तन का हो
ये प्रेम का तृतीय रूप है
एक मन से मन का , दिल से दिल का
ये प्रेम का द्वितीय रूप है
प्रेम का पूर्ण सार्थक रूप
आत्मा से आत्मा का है
जब ये जुड़ाव हो जाता है
तो द्वितीय अपने आप जुड़ जाता है
अंतिम तृतीय के लिए जद्दोजहद करने की
कोई आवश्यकता ही नहीं पड़ती वो
स्वयं पूर्णता को प्राप्त कर लेता है ।