दल बदल
दल बदलू का दल बदला , पर दिल नहिं बदला जाय।
धरिणी गगन मिलत दिखें , फिर भी क्षितिज कहाय।।
काला धन
काला धन जिन चाहिए , ढूंढें सुरक्षित गेह।
मगर मुंह में पग पकड़ , गहरे पानी खेह।।
--अशर्फी लाल मिश्र , अकबरपुर ,कानपुर।
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।