नए-नए सज कर बैठे थे हम,
लोगो ने क्या समझा?
नए जोड़े पहने थे हम,
मर्दों ने क्या समझा?
दुल्हन... दुल्हन...!
लौट आए हैं वो हसीन ख़्वाब पुराने,
लौट आए हैं वो हसीन ख़्वाब पुराने,
पर लोग... लोग न जाने क्या-क्या सोचते हैं!
आँखें देख-देख कर हमें आईने में,
वो आईना... आईना खुद हममें ही कुछ ढूँढ रहा है!
क्या लौट आऊँ फिर से उन आँखों में?
समेट कर सारी खूबियाँ अपनी,
कहीं शांत बैठ जाऊँ मैं...
पर अक्ल पर पड़े हैं जो ये गहरे पर्दे,
तुम ही बताओ, किन-किन को समझाऊँ मैं?
तैयार खड़ी हूँ, नया-नया सज कर बैठी हूँ,
मगर... दुल्हन तो नहीं!
दुल्हन तो नहीं...!