काँच के पीछे चाँद भी था और काँच के ऊपर काई भी,
तीनों थे हम—वो भी थे और मैं भी था, तन्हाई भी।
चाँद को देखते रहे हम, मगर चाँद ने देखा नहीं,
वो पास होकर भी मेरे पास कभी ठहरा नहीं।
काई जमी थी शीशे पर, धुंधली थी हर परछाई भी,
कुछ कहने को लफ़्ज़ नहीं थे, आँखों में गहराई भी।
वो खामोश खड़े थे और मैं खामोशी पढ़ता रहा,
उनकी आँखों में छुपे हुए हर राज़ को गिनता रहा।
शाम ढली तो चाँदनी ने भी अपना रंग बदल लिया,
वक़्त ने हमसे जाने क्या-क्या धीरे-धीरे छीन लिया।
वो सामने थे फिर भी जैसे कोई दूरी बाकी थी,
उनके साथ भी दिल में जाने कैसी तन्हाई बाकी थी।
काँच साफ़ करता रहा मैं, मगर तस्वीर साफ़ न हुई,
वो मेरे थे या नहीं—ये बात कभी साफ़ न हुई।
चाँद ढल गया, काई रह गई, रह गई आँखों में नमी,
वो भी चले गए चुपचाप और साथ चली गई ख़ामोशी।
गुप्ता जी