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स्मृतिशेष- पाश की चुनिंदा कविताएं

हरि कर्की

Main Inka Mureed
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                                                  23 मार्च 1931, 23 वर्षीय क्रांतिकारी भगत सिंह को लाहौर जेल में समय से पहले फांसी दे दी जाती है। उनकी शहादत के 51 सालों बाद पंजाब का एक और क्रांतिकारी कवि उनको याद करता हुआ 23 मार्च 1982 को अपनी डायरी में एक कविता लिखता है।

द्वंद्व या टकराव के इस कवि का नाम था अवतार सिंह संधू 'पाश'। पाश आंदोलन के कवि थे और जिन्होंने केवल राजनीतिक कविताएं नहीं कहीं बल्कि स्वयं भी राजनीति कर्मी रहे। एक क्रांतिकारी कवि होने के खतरे उठाने वाले पाश ने अपनी कलात्मक चेतना के लिए जरूरी बुनियादी आत्मसंघर्ष भी किया जो उनकी कविताओं का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है।

पाश एक ऐसे कवि हैं जिनकी तमाम कविताएं हमारे सामने उदाहरण की तरह समय-समय पर आकर टकरातीं हैं। पाश की गिनती उन थोड़े से कवियों में होती है जो आपके भीतर के उन प्रश्नों को आपके सामने उठा कर रख देती है जिनसे आप बचते हैं। जिनके उत्तर आपको भी बेचैन करते हैं।
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पाश की कविताओं के कुछ हिस्से

संघर्ष का ये कवि क्रांतिकारी भगत सिंह की ही तरह उनकी शहादत के दिन 23 मार्च को कविता के पैमानों से प्रतिरोध गढ़ता हुआ, अतिवादियों के बदले का शिकार हो गया और वापस कविता की जमीन पर हमेशा के लिए लौट गया।

आज पेश है पाश की कविताओं के कुछ हिस्से --
 
हम झूठ-मूठ का कुछ भी नहीं चाहते
जिस तरह हमारे बाजुओं में मछलियां हैं,
जिस तरह बैलों की पीठ पर उभरे
सोटियों के निशान हैं,
जिस तरह कर्ज के कागजों में
हमारा सहमा और सिकुड़ा भविष्य है
हम जिंदगी, बराबरी या कुछ भी और
इसी तरह सचमुच का चाहते हैं

(कविता का शीर्षक -- प्रतिबद्धता)
 

युद्ध हमारे बच्चों के लिए गेंद बनकर आयेगा

क्रांति कोई दावत नहीं, नुमाइश नहीं
मैदान में बहता दरिया नहीं
वर्गों का, रुचियों का दरिन्दाना भिड़ना है
मरना है, मारना है
और मौत को खत्म करना है।

(कविता का शीर्षक -- खुला खत)


 
युद्ध हमारे बच्चों के लिए गेंद बनकर आयेगा
युद्ध हमारी बहनों के लिए कढ़ाई के सुंदर नमूने लायेगा
युद्ध बूढ़ी मां के लिए निगाह की ऐनक बनेगा
युद्ध हमारे बड़ों की कब्रों पर फूल बनकर खिलेगा
वक्त बहुत देर
किसी बेकाबू घोड़े जैसा रहा है
जो हमें घसीटता हुआ जिंदगी से बहुत दूर ले गया है
कुछ नहीं बस युद्ध ही इस घोड़े की लगाम बन सकेगा
 
(कविता का शीर्षक -- युद्ध और शांति)

शहीद होने की घड़ी में वह अकेला था ईश्वर की तरह

मैं घास हूँ
मैं आपके हर किए-धरे पर उग आऊँगा

(कविता का शीर्षक -- घास)


उसकी शहादत के बाद बाक़ी लोग
किसी दृश्य की तरह बचे
ताजा मुंदी पलकें देश में
सिमटती जा रही झाकी की
देश सारा बच रहा बाक़ी
उसके चले जाने के बाद
उसकी शहादत के बाद
अपने भीतर खुलती खिड़की में
लोगों की आवाज़ें जम गई
.......
शहीद होने की घड़ी में वह अकेला था ईश्वर की तरह
लेकिन ईश्वर की तरह वह निस्तेज न था।

(कविता का शीर्षक --- 23 मार्च)

 
2 वर्ष पहले
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