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वे ग़ज़लें जिन्हें मिली स्वर-साम्राज्ञी लता मंगेशकर की आवाज़

दीपाली अग्रवाल

Urdu Adab Kavya Charcha
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भारत रत्न लता मंगेशकर को सुर-साम्राज्ञी कहा जाता है। उन्होंने फ़िल्मी दुनिया को एक से बढ़कर एक हिट दिए। यदि फ़िल्मी-गीतों को सदाबहार कहा गया तो संभवत: वह उनकी आवाज़ के कारण ही कहा गया होगा। लता जी ने 30 से ज़्यादा भाषाओं में फ़िल्मी और ग़ैर-फ़िल्मी गाने गाए हैं, ग़ैर-फ़िल्मी में ग़ज़लें भी शामिल हैं। पढ़े वह ग़ज़लें जिन्हें लता जी के कंठ की वीणा मिली।

आँख से आँख मिलाता है कोई / शकील बदायुनी

आँख से आँख मिलाता है कोई
दिल को खींचे लिए जाता है कोई

वाए हैरत कि भरी महफ़िल में
मुझ को तन्हा नज़र आता है कोई

सुब्ह को ख़ुनुक फ़ज़ाओं की क़सम
रोज़ आ आ के जगाता है कोई



मंज़र-ए-हुस्न-ए-दो-आलम के निसार
मुझ को आईना दिखाता है कोई

चाहिए ख़ुद पे यक़ीन-ए-कामिल
हौसला किस का बढ़ाता है कोई

सब करिश्मात-ए-तसव्वुर हैं 'शकील'
वर्ना आता है न जाता है कोई

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हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी / मिर्ज़ा ग़ालिब

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले



मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

कहाँ मय-ख़ाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहाँ वाइ'ज़
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले

दिल में अब दर्द-ए-मुहब्बत के सिवा / साहिर भोपाली

दिल में अब दर्द-ए-मुहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं
ज़िन्दगी मेरी इबादत के सिवा कुछ भी नहीं 

मैं तेरी बरह-गह-ए-नाज़ में क्या पेश करूं
मेरी झोली में मुहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं 



ऐ खुदा मुझसे ना ले मेरे गुनाहों का हिसाब
मेरे पास अश्क़-ए-नदमत के सिवा कुछ भी नहीं 

वो तो मिट कर मुझ को मिल ही गयी राहत वरना
ज़िन्दगी रन्ज़-ओ-मुसीबत के सिवा कुछ भी नहीं 

फिर छिड़ी रात बात फूलों की / मख़दूम मुहिउद्दीन

फिर छिड़ी रात बात फूलों की
रात है या बरात फूलों की

फूल के हार फूल के गजरे
शाम फूलों की रात फूलों की

आप का साथ साथ फूलों का
आप की बात बात फूलों की

नज़रें मिलती हैं जाम मिलते हैं
मिल रही है हयात फूलों की

फूल खिलते रहेंगे दुनिया में
रोज़ निकलेगी बात फूलों की

ये महकती हुई ग़ज़ल 'मख़दूम'
जैसे सहरा में रात फूलों की

हर तरफ़ हर जगह बे-शुमार आदमी / निदा फ़ाज़ली

हर तरफ़ हर जगह बे-शुमार आदमी
फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी

सुब्ह से शाम तक बोझ ढोता हुआ
अपनी ही लाश का ख़ुद मज़ार आदमी

हर तरफ़ भागते दौड़ते रास्ते
हर तरफ़ आदमी का शिकार आदमी



रोज़ जीता हुआ रोज़ मरता हुआ
हर नए दिन नया इंतिज़ार आदमी

घर की दहलीज़ से गेहूँ के खेत तक
चलता फिरता कोई कारोबार आदमी

ज़िंदगी का मुक़द्दर सफ़र-दर-सफ़र
आख़िरी साँस तक बे-क़रार आदमी

4 वर्ष पहले
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