अपने विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम मातृभाषा है। इसी के जरिये हम अपनी बात को सहजता और सुगमता से दूसरों तक पहुंचा पाते हैं। हिंदी की लोकप्रियता और पाठकों से उसके दिली रिश्तों को देखते हुए उसके प्रचार-प्रसार के लिए अमर उजाला ने ‘हिंदी हैं हम’ अभियान की शुरुआत की है। इस कड़ी में साहित्यकारों के लेखकीय अवदानों को अमर उजाला और अमर उजाला काव्य #हिंदीहैंहम श्रृंखला के तहत पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा है। इस कड़ी में आज कुछ बातें व विचार शिवमंगल सिंह सुमन की कविताई पर-
क्या हार में क्या जीत में
किंचित नहीं भयभीत मैं
संघर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही वह भी सही
शिवमंगल सिंह सुमन की लिखी इन पंक्तियों को भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अक्सर सुनाया करते थे। यहां तक कि कई लोग मानते रहे कि यह वाजपेयी की लिखी कविता है। शिवमंगल सिंह सुमन की कविताओं में प्रभाव था कि वह आम से लेकर ख़ास तक सभी को स्वयं से जोड़ सकें। हिंदी हैं हम श्रृंखला के अंतर्गत आज हम जानेंगे मूर्धन्य कवि शिवमंगल सिंह सुमन के बारे में।
शिवमंगल सिंह सुमन का जन्म 5 अगस्त 1915 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के झगरपुर में हुआ था। प्रारम्भिक शिक्षा के बाद ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज से बी.ए.और काशी हिंदू विश्वविद्यालय से एम एऔर पीएचडी की। इसके बाद वे ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज में हिंदी के व्याख्याता, माधव महाविद्यालय उज्जैन के प्राचार्य और फिर कुलपति रहे। अध्यापन के अतिरिक्त विभिन्न महत्त्वपूर्ण संस्थाओं और प्रतिष्ठानों से जुड़कर उन्होंने हिंदी साहित्य में वृद्धि की। शिवमंगल सिंह सुमन अध्यापक, कुशल प्रशासक, प्रखर चिंतक और विचारक भी थे।
उनसे संबंधित एक घटना भी है जहां उल्लेख मिलता है कि उन्होंने चंद्रशेखर आज़ाद की मदद की थी और इसके लिए उनके ख़िलाफ़ वारंट भी जारी हुआ था। एक बार उनकी आंखों पर पट्टी बांधकर उन्हें एक अज्ञात स्थान पर ले जाया गया। जब आंख की पट्टी खोली गई तो वह हतप्रभ थे। उनके समक्ष स्वतंत्रता संग्राम के महायोद्धा चंद्रशेखर आज़ाद खड़े थे। आज़ाद ने उनसे प्रश्न किया था, क्या यह रिवाल्वर दिल्ली ले जा सकते हो। सुमन जी ने बेहिचक प्रस्ताव स्वीकार कर लिया था।
शिवमंगल सिंह सुमन की प्रमुख रचनाओं में शामिल हैं - हिल्लोल, जीवन के गान, प्रलय-सृजन, विंध्य हिमालय, मिट्टी की बारात आदि जिनमें से मिट्टी की बारात के लिए उन्हें साहित्य अकादमी से सम्मानित किया गया था। उनकी गद्य रचनाओं में शामिल हैं महादेवी की काव्य साधना और गीति काव्य: उद्यम और विकास। प्रकृति पुरुष कालिदास उनका लिखा नाटक है। शिवमंगल सिंह सुमन को 1974 में पद्मश्री और 1999 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। 27 नवंबर 2002 को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। पेश हैं उनकी कुछ चुनिंदा कविताएं
यह हार एक विराम है
जीवन महासंग्राम है
तिल-तिल मिटूंगा पर दया की भीख मैं लूंगा नहीं
वरदान मांगूंगा नहीं
स्मृति सुखद प्रहरों के लिए
अपने खण्डहरों के लिए
यह जान लो मैं विश्व की सम्पत्ति चाहूंगा नहीं
वरदान मांगूंगा नहीं
क्या हार में क्या जीत में
किंचित नहीं भयभीत मैं
संघर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही वह भी सही
वरदान मांगूंगा नहीं
लघुता न अब मेरी छुओ
तुम हो महान बने रहो
अपने हृदय की वेदना मैं व्यर्थ त्यागूंगा नहीं
वरदान मांगूंगा नहीं
चाहे हृदय को ताप दो
चाहे मुझे अभिशाप दो
कुछ भी करो कर्त्तव्य पथ से किन्तु भागूंगा नहीं
वरदान मांगूंगा नहीं
मैं नहीं आया तुम्हारे द्वार
मैं नहीं आया तुम्हारे द्वार
पथ ही मुड़ गया था।
गति मिली मैं चल पड़ा
पथ पर कहीं रुकना मना था,
राह अनदेखी, अजाना देश
संगी अनसुना था।
चांद सूरज की तरह चलता
न जाना रात दिन है,
किस तरह हम तुम गए मिल
आज भी कहना कठिन है,
तन न आया मांगने अभिसार
मन ही जुड़ गया था।
देख मेरे पंख चल, गतिमय
लता भी लहलहाई
पत्र आँचल में छिपाए मुख
कली भी मुस्कुराई।
एक क्षण को थम गए डैने
समझ विश्राम का पल
पर प्रबल संघर्ष बनकर
आ गई आंधी सदलबल।
डाल झूमी, पर न टूटी
किंतु पंछी उड़ गया था।
6 वर्ष पहले