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पत्रकारिता दिवस - ऐसे कवि जिन्होंने पत्रकारिता धर्म भी ख़ूब निभाया

दीपाली अग्रवाल

Kavya Charcha
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आज हिंदी पत्रकारिता दिवस है। आज ही के दिन पहला हिंदी अख़बार उदन्त मार्तण्ड प्रकाशित किया गया था। जिसे पं. युगल किशोर शुक्ल ने प्रकाशित करवाया था। इसलिए हर 30 मई को यह दिवस मनाया जाता है। इसी क्रम में आइए जानते हैं कि ऐसे कौन से कवि थे जो पत्रकार भी थे।
 
माखनलाल चतुर्वेदी

हिम-तरंगिणी लिखने वाले माखनलाल चतुर्वेदी एक कवि होने के साथ- साथ एक पत्रकार भी थे। उन्हें साहित्य अकादमी से सम्मानित किया जा चुका है। उनकी यह रचना लोगों को मुंह ज़ुबानी याद है।

चाह नहीं मैं सुरबाला के
 गहनों में गूँथा जाऊँ,
चाह नहीं, प्रेमी-माला में
 बिंध प्यारी को ललचाऊँ,
चाह नहीं, सम्राटों के शव
पर हे हरि, डाला जाऊँ,
चाह नहीं, देवों के सिर पर
चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ।
मुझे तोड़ लेना वनमाली!
उस पथ पर देना तुम फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जावें वीर अनेक
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रघुवीर सहाय

रघुवीर सहाय

कवि रघुवीर सहाय साप्ताहिक पत्रिका दिनमान के संपादक थे। उन्हें उनके काव्य संग्रह लोग भूल गए हैं के लिए साहित्य अकादमी से सम्मानित किया गया था। उनकी लिखी एक कविता

अरे अब ऐसी कविता लिखो
कि जिसमें छंद घूमकर आय
घुमड़ता जाय देह में दर्द
कहीं पर एक बार ठहराय

कि जिसमें एक प्रतिज्ञा करूं
वही दो बार शब्द बन जाय
बताऊँ बार-बार वह अर्थ
न भाषा अपने को दोहराय

अरे अब ऐसी कविता लिखो
कि कोई मूड़ नहीं मटकाय
न कोई पुलक-पुलक रह जाय
न कोई बेमतलब अकुलाय

छंद से जोड़ो अपना आप
कि कवि की व्यथा हृदय सह जाय
थामकर हँसना-रोना आज
उदासी होनी की कह जाय ।

धर्मवीर भारती

धर्मवीर भारती एक समय की प्रख्यात साप्ताहिक पत्रिका धर्मयुग के प्रधान संपादक थे। उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है। उनका उपन्यास गुनाहों का देवता सदाबहार रचना मानी जाती है लेकिन उन्होंने कई कविताएं भी लिखी हैं।

प्रार्थना की एक अनदेखी कड़ी
बाँध देती है, तुम्हारा मन, हमारा मन,
फिर किसी अनजान आशीर्वाद में-डूबन
मिलती मुझे राहत बड़ी!

प्रात सद्य:स्नात कन्धों पर बिखेरे केश
आँसुओं में ज्यों धुला वैराग्य का सन्देश
चूमती रह-रह बदन को अर्चना की धूप
यह सरल निष्काम पूजा-सा तुम्हारा रूप
जी सकूँगा सौ जनम अँधियारियों में, 
यदि मुझे मिलती रहे
काले तमस की छाँह में
ज्योति की यह एक अति पावन घड़ी!
प्रार्थना की एक अनदेखी कड़ी!

चरण वे जो लक्ष्य तक चलने नहीं पाये
वे समर्पण जो न होठों तक कभी आये
कामनाएँ वे नहीं जो हो सकीं पूरी-
घुटन, अकुलाहट, विवशता, दर्द, मजबूरी-
जन्म-जन्मों की अधूरी साधना,
पूर्ण होती है किसी मधु-देवता की बाँह में!
ज़िन्दगी में जो सदा झूठी पड़ी-
प्रार्थना की एक अनदेखी कड़ी!

अज्ञेय

अज्ञेय

अज्ञेय नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक के तौर पर काम कर चुके हैं। साथ ही उन्होंने दिनमान का संपादन भी किया। उनकी लिखी कविता 

यह दीप अकेला स्नेह भरा 
है गर्व भरा मदमाता पर 
इसको भी पंक्ति को दे दो 

यह जन है : गाता गीत जिन्हें फिर और कौन गायेगा 
पनडुब्बा : ये मोती सच्चे फिर कौन कृति लायेगा? 
यह समिधा : ऐसी आग हठीला बिरला सुलगायेगा 
यह अद्वितीय : यह मेरा : यह मैं स्वयं विसर्जित : 

यह दीप अकेला स्नेह भरा 
है गर्व भरा मदमाता पर 
इस को भी पंक्ति दे दो 

यह मधु है : स्वयं काल की मौना का युगसंचय 
यह गोरसः जीवन-कामधेनु का अमृत-पूत पय 
यह अंकुर : फोड़ धरा को रवि को तकता निर्भय 
यह प्रकृत, स्वयम्भू, ब्रह्म, अयुतः 
इस को भी शक्ति को दे दो 
 
7 वर्ष पहले
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