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इंसानियत को बयां करते ये 10 शेर आपको देंगे हिम्मत और हौसला 

काव्य डेस्क

Kavya Charcha
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                                                  तनाव भरे इस दौर में आज ठहर कर जीना काफी कठिन चुनौती है। भाग दौड़ की इस दुनिया में आदमी आज आदमी को भूलते जा रहा है। धैर्य और संकल्प से आदमी अपनी राह चले तो वह सफल हो जाएगा और उसमें इंसानियत भी कायम रहेगी। इंसानियत को शिद्दत से बयां करने वाले 10 बेहतरीन शेर काव्य चर्चा के इस सेक्‍शन में हम आप सभी कविता प्रेमी पाठकों के लिए साझा कर रहे हैं। उम्मीद है शायरी का यह गुलदस्ता आपको अवश्य पसंद आएगा। और आप इन शेरों को अपनी निजी जिंदगी में गुनगुनाने लगेंगे।    
                                                              
                  

                    
                                        
                         
                                                                                   
                            
                         
                                                            
                                
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आपसे झुक के जो मिलता होगा... 

आपसे झुक के जो मिलता होगा 
उसका कद आपसे ऊंचा होगा
-अहमद नदीम 'कासमी' 

फूलों को मैं बिछाऊं कहां है मेरी बिसात
कांटे उठा लिए हैं मगर तेरी राह से 
-अल्लाह मेहर 'शाहिद'

बस कि दुश्वार है हर काम का आसां होना... 

बस कि दुश्वार है हर काम का आसां होना 
आदमी को भी मय्यसर नहीं इंसां होना 
-'गालिब'

देखा उन्हें करीब से हमने तो रो ‌दिए
जिन बस्तियों को आग लगाने चले थे हम 
-खुर्शीद-उल-इस्लाम

सीख ले फूलों से गाफिल मुद्दआ-ए-जिंदगी...

सीख ले फूलों से गाफिल मुद्दआ-ए-जिंदगी
खुद महकना ही नहीं, गुलशन को महकाना भी है
-असर लखनवी 

हर एक शय और महंगी और महंगी होती जाती है
बस इक खूने-बशर है जिसकी अर्जानी नहीं जाती
-अली सरदार जाफरी

आसमानों से बरसता है अंधेरा कैसा... 

आसमानों से बरसता है अंधेरा कैसा 
अपनी पलकों पे ‌लिए जश्ने-चिरागां चलिए 
-अली सरदार जाफरी 

धूप में प्यासे को पानी, शब को रस्ते में चिराग 
जाने वाले लोग कितने साहिबे-किरदार थे 
-शेख परवेज आरिफ 
 

रखते हैं जो औरों के लिए प्यार का जज्बा... 

रखते हैं जो औरों के लिए प्यार का जज्बा 
वो लोग कभी टूट कर बिखरा नहीं करते
-अज्ञात 

हम वो सियाहबख्त हैं रिजवी कि शहर में 
खोलें दुकान कफ्न की, सब मरना छोड़ दें
-रिजवी 

साभार-अंदाज अपना अपना
संकलन-रमेश चंद्र
भारतीय ज्ञानपीठ 

 
8 वर्ष पहले
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