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हर दौर में प्रासंगिक रहने वाली अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं के अंश....

रत्नेश मिश्र

Kavya Charcha
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                                                  अटल बिहारी के राजनैतिक व्यक्तित्व से सभी भलीभांति परिचित हैं और यह भी जानते हैं कि वह कविताएं भी लिखा करते थे, चुनावी वातावरण है और अटल जी
की कुछ कविताएं बेसाख़्ता याद आती हैं। पेश हैं उनकी कविताओं से वे अंश जो हमेशा, हर दौर में प्रासंगिक रहेंगे- 

बेनकाब चेहरे हैं, दाग बड़े गहरे हैं 
टूटता तिलिस्म आज सच से भय खाता हूं
गीत नहीं गाता हूं 

~अटल बिहारी वाजपेयी
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हर दौर में प्रासंगिक रहने वाली अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं के अंश...

खून क्यों सफेद हो गया?
भेद में अभेद खो गया
बंट गये शहीद, गीत कट गए,
कलेजे में कटार दड़ गई
दूध में दरार पड़ गई

~अटल बिहारी वाजपेयी

हर दौर में प्रासंगिक रहने वाली अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं के अंश...

क्षमा करो बापू! तुम हमको,
बचन भंग के हम अपराधी,
राजघाट को किया अपावन,
मंज़िल भूले, यात्रा आधी।

~अटल बिहारी वाजपेयी

हर दौर में प्रासंगिक रहने वाली अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं के अंश...

कौरव कौन
कौन पांडव
टेढ़ा सवाल है
दोनों ओर शकुनि
का फैला
कूटजाल है।

हर दौर में प्रासंगिक रहने वाली अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं के अंश...

बिना कृष्ण के
आज
महाभारत होना है,
कोई राजा बने,
रंक को तो रोना है।

हर दौर में प्रासंगिक रहने वाली अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं के अंश...

सत्य का संघर्ष सत्ता से
न्याय लड़ता निरंकुशता से
अंधेरे ने दी चुनौती है
किरण अंतिम अस्त होती है

~अटल बिहारी वाजपेयी

हर दौर में प्रासंगिक रहने वाली अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं के अंश...

ऊँचे पहाड़ पर, पेड़ नहीं लगते,
पौधे नहीं उगते, न घास ही जमती है
जमती है सिर्फ बर्फ,
जो, कफ़न की तरह सफ़ेद और,
मौत की तरह ठंडी होती है।

~अटल बिहारी वाजपेयी

हर दौर में प्रासंगिक रहने वाली अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं के अंश...

ठन गई, मौत से ठन गई! 
जूझने का मेरा इरादा न था, 
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था, 
रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई, 
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई। 

~अटल बिहारी वाजपेयी

हर दौर में प्रासंगिक रहने वाली अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं के अंश...

सूर्य एक सत्य है 
जिसे झुठलाया नहीं जा सकता 
मगर ओस भी तो एक सच्चाई है 
यह बात अलग है कि ओस क्षणिक है 
क्यों न मैं क्षण क्षण को जिऊं? 
कण-कण में बिखरे सौन्दर्य को पिऊं? 

~अटल बिहारी वाजपेयी

हर दौर में प्रासंगिक रहने वाली अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं के अंश...

मेरे प्रभु!
मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना,
ग़ैरों को गले न लगा सकूँ,
इतनी रुखाई कभी मत देना।

~अटल बिहारी वाजपेयी
7 वर्ष पहले
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