विज्ञापन

शायद आग़ाज़ हुआ फिर किसी अफ़साने का...

काव्य डेस्क

Irshaad
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            शकील बदायूंनी
        
                                                    
                            

शायद आग़ाज़ हुआ फिर किसी अफ़साने का
हुक्म आदम को है जन्नत से निकल जाने का 

उनसे कुछ कह तो रहा हूं मगर अल्लाह न करे 
वो भी मफ़हूम न समझे मेरे अफ़साने का 

देखना देखना ये हज़रत-ए-वाइज़ ही न हों 
रास्ता पूछ रहा है कोई मैख़ाने का 

बेताल्लुक़ तेरे आगे से गुज़र जाता हूं 
ये भी एक हुस्न-ए-तलब है तेरे दीवाने का 

हश्र तक गर्मी-ए-हंगामा-ए-हस्ती है 'शकील'
सिलसिला ख़त्म न होगा मेरे अफ़साने का

साभार- कविता कोश 
9 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all