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जो हर्फ़ ज़बां पर लाएंगे फिर वो ही कर दिखलाएंगे हम - नज़ीर अकबराबादी

दीपाली अग्रवाल

Irshaad
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हर आन तुम्हारे छुपने से ऐसा ही अगर दुख पाएंगे हम


तो हार के इक दिन इस की भी तदबीर कोई ठहराएंगे हम

बेज़ार करेंगे ख़ातिर को पहले तो तुम्हारी चाहत से
फिर दिल को भी कुछ मिन्नत से कुछ हैबत से समझाएंगे हम

गर कहना दिल ने मान लिया और रुक बैठा तो बेहतर है
और चैन न लेने देवेगा तो भेस बदल कर आएंगे हम

अव्वल तो नहीं पहचानोगे और लोगे भी पहचान तो फिर
हर तौर से छुप कर देखेंगे और दिल को ख़ुश कर जाएंगे हम

गर छुपना भी खुल जावेगा तो मिल कर अफ़्सूं-साज़ों से
कुछ और ही लटका सेहर-भरा उस वक़्त बहम पहुंचाएंगे हम

जब वो भी पेश न जावेगा और शोहरत होवेगी फिर तो
जिस सूरत से बन आवेगा तस्वीर खिंचा मंंगवाएंगे हम

मौक़ूफ़ करोगे छुपने को तो बेहतर वर्ना 'नज़ीर' आसा
जो हर्फ़ ज़बां पर लाएंगे फिर वो ही कर दिखलाएंगे हम
6 वर्ष पहले
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