आपका शहर Close
Hindi News ›   Kavya ›   Kavya Charcha ›   Famous Writer and Poet Rahi Masoom Raza Will Be Remembered Forever
राही मासूम रज़ा

काव्य चर्चा

राही मासूम रज़ा : मेरे बिना किस हाल में होगा, कैसा होगा चाँद

संजीव ‘मजदूर’ झा, नई दिल्ली

7367 Views
‘हम तो हैं परदेस में देस में निकला होगा चाँद’ में परदेश से देश की चिंता और ‘कालिदास के मेघदूत’ से महादेव को संदेश पहुँचाना साथ ही जीवन में साम्यवादी आदर्शों को अपनाना, असल मायने में भारतीयता के उस चित्र को दिखाता है जिसकी परिकल्पना सभी आदर्श पुरुषों ने की है। राही मासूम रज़ा इसी चित्र के सबसे महत्वपूर्ण रंग हैं, जिनकी रचनाओं में संपूर्ण भारतीय संस्कृति की छाप देखने को मिलती है। गाज़ीपुर के गंगोली गाँव में 1 सितंबर 1927 में जन्मे डॉ. राही मासूम रज़ा एक ऐसे रचनाकार के रूप में प्रतिष्ठित हुए जिनकी रचनात्मक उम्र संस्कृत से उर्दू तक और महाकाव्य से ग़ज़लों तक की रही है। भारतीय संस्कृति को गहराई से पहचानने वाले रज़ा साहब को रचना के लगभग हर क्षेत्र में बेशुमार शोहरत मिली। उपन्यास से लेकर काव्य तक और ग़ज़ल से लेकर फ़िल्म संवाद तक कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं जहाँ रज़ा साहब ने अपनी मज़बूत शैली के साथ हस्तक्षेप न किया हो। महाभारत के कभी ना भुलाए जा सकने वाले डायलॉग्स आज भी उनकी अद्भुत शैली का रंग बिखेरते हैं। 

प्रेमचंद ने सृजन और साहित्य पर बात करते हुए कहा था, "सीमा के उल्लंघन में ही सीमा की मर्यादा है।" राही मासूम रज़ा की रचनात्मकता को इसी आधार पर समझा जा सकता है। यही कारण है कि एक तरफ रज़ा साहब लिखते हैं कि - 

ऐ आवारा यादों फिर ये फ़ुर्सत के लम्हात कहाँ?  
हमने तो सहरा में बसर की तुम ने गुज़ारी रात कहाँ? 


तो दूसरी ओर अपने समाज की त्रासदी पर ‘गंगा और महादेव’ शीर्षक से कविता में कहते हैं - 

मेरा नाम मुसलमानों जैसा है 
मुझको क़त्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो 
मेरे उस कमरे को लूटो जिसमें मेरी बयाने जाग रही हैं 
और मैं जिसमें तुलसी की रामायण से सरगोशी करके 
कालीदास के मेघदूत से यह कहता हूँ 
मेरा भी एक संदेश है। 
 
मेरा नाम मुसलमानों जैसा है 
मुझको क़त्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो 
लेकिन मेरी रग-रग में गंगा का पानी दौड़ रहा है 
मेरे लहू से चुल्लू भर महादेव के मुँह पर फेंको 
और उस योगी से कह दो- महादेव 
अब इस गंगा को वापस ले लो 
यह जलील तुर्कों के बदन में गढ़ा गया 
लहू बनकर दौड़ रही है। 


राही मासूम रज़ा कट्टरता के सख़्त विरोधी रचनाकार तो थे ही लेकिन उनका विरोध अपने अंदर एक मूल्यवान सांस्कृतिक पहचान को समेटे हुए था। वे जानते थे कि सामाजिक कुरीतियों का निवारण हमारी अपनी संस्कृति से ही निकल कर आएगी। इसीलिए न उनसे तुलसी छूट पाए और न कालिदास और इसीलिए वे कालिदास के मेघदूत से महादेव को संदेश पहुँचाने की बात करते हैं। विभाजन से आहत रज़ा साहब हमेशा मिली-जुली संस्कृति के पैरोकार रहे हैं। यही कारण था कि सिर्फ़ रचना के स्तर पर ही नहीं बल्कि राजनीतिक स्तर पर भी वे सामाजिक समानता के प्रति संघर्षरत रहे। जीवन में संघर्ष को उन्होंने बहुत ही कम उम्र में अनुभव किया था। बचपन में पोलियो की बीमारी के कारण उन्हें पढ़ाई तक छोड़नी पड़ी, लेकिन वे हार मानने वालों में से नहीं थे। उन्होंने फिर से पढ़ना शुरू किया और पी-एच.डी तक की पढ़ाई को पूरा किया। ज़िदगी को आज़माना जैसे रज़ा साहब के बचपने का खेल सा हो गया। इसी तरह वे अपने नज़्मों में भी संघर्ष को बड़े आशिकाना ढंग से पेश करते रहे - 

"जहर मिलता रहा, 
जहर पीते रहे 
जिन्दगी भी हमें आजमाती रही
और हम भी उसे आजमाते रहे।" 
आगे पढ़ें

हम क्या जानें किस्सा क्या था, हम ठहरे दीवाने लोग

सर्वाधिक पढ़े गए
Top

Other Properties:

Disclaimer

अपनी वेबसाइट पर हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर अनुभव प्रदान कर सकें, वेबसाइट के ट्रैफिक का विश्लेषण कर सकें, कॉन्टेंट व्यक्तिगत तरीके से पेश कर सकें और हमारे पार्टनर्स, जैसे की Google, और सोशल मीडिया साइट्स, जैसे की Facebook, के साथ लक्षित विज्ञापन पेश करने के लिए उपयोग कर सकें। साथ ही, अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।

Agree
Your Story has been saved!