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धर्मवीर भारती: मुझको जीवन ने जिया - बूँद-बूँद कर पिया, मुझको

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मैं क्या जिया ?

मुझको जीवन ने जिया-
बूँद-बूँद कर पिया, मुझको
पीकर पथ पर ख़ाली प्याले-सा छोड़ दिया

मैं क्या जला?
मुझको अग्नि ने छला-
मैं कब पूरा गला, मुझको
थोड़ी-सी आँच दिखा दुर्बल मोमबत्ती-सा मोड़ दिया

देखो मुझे
हाय मैं हूँ वह सूर्य
जिसे भरी दोपहर में
अँधियारे ने तोड़ दिया! 
 

3 महीने पहले

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