[यह लेख रीवा, मध्य प्रदेश से प्रो. सेवाराम त्रिपाठी ने लिखा है।]
"तुम्हारे शहर में ये शोर सुन-सुन कर तो लगता है
कि इंसानों के जंगल में कोई हाँका हुआ होगा
कई फ़ाक़े बिता कर मर गया जो उस के बारे में
वो सब कहते हैं अब ऐसा नहीं ऐसा हुआ होगा
यहाँ तो सिर्फ़ गूँगे और बहरे लोग बस्ते हैं
ख़ुदा जाने यहाँ पर किस तरह जलसा हुआ होगा"
यूँ तो जनता की कविता की जब भी हम बात करते हैं तो हमारे सामने वह कविता अवश्य होती है जो जनता के सुख-दुख में उसके संघर्षों में, उसके जीवन संग्राम में हमेशा साथ होती है। आज़ादी के बाद की जनपक्षधरताओं और जनसंघर्षों की कविता में नागार्जुन, रघुवीर सहाय, रमेश रंजक, गोरख पाण्डे, मुकुट बिहारी सरोज जैसे कई कवि हैं।
ऐसे जनपक्षधर कवियों में शलभ श्रीराम सिंह और दुष्यंत कुमार भी शामिल हैं। दुष्यन्त कुमार का जन्म उत्तर प्रदेश में बिजनौर के राजपुर नवादा में एक सितम्बर 1933 को हुआ और निधन भोपाल में 30 दिसम्बर 1975 को हुआ था। दुष्यंत कुमार की शख़्सियत पर बात करने से पहले हमें हस्तक्षेप और प्रतिरोध के बारे में भी जानना ज़रूरी है।
हस्तक्षेप और प्रतिरोध ये दो ऐसे शब्द हैं जिनसे रचनाकार के व्यापक सरोकारों का पता चलता है। यह भी ज्ञात होता है कि उसके सामाजिक ’कन्सर्न’ क्या हैं और किस तरह के हैं। हस्तक्षेप मतलब दूसरे के काम में हाथ डालना।
कोई भी रचनाकार सत्ता, व्यवस्था या किसी की मनमानी के ख़िलाफ़ जब सामान्य कार्यवाही करता है तो हम उसे हस्तक्षेप कह सकते हैं, लेकिन जब यह कार्यवाही व्यापक स्तर पर विरोध के रूप में या परिवर्तन की प्रक्रिया के रूप में बड़े व्यापक पैमाने पर की जाती है, तब उसे हस्तक्षेप नहीं प्रतिरोध ही कहा जाता है।
दुष्यंत एक परिवर्तनकामी रचनाकर हैं। वे जीवन की सहजता में विश्वास करने वाले लेखक हैं। अपनी अनुभूति को ईमानदारी के साथ पेश करते हैं। दुष्यंत की चेतना का विकास दरअसल आज़ादी के बाद के स्वप्नों, कठोर हक़ीक़तों, आज़ादी से मोहभंग और जनतंत्र के विरोधाभासों विसंगतियों और एक ऐसे भारत के बनने का अंग है जहाँ साम्राज्यवाद, पूंजीवाद और कठोर व्यक्तिवाद का ताना-बाना है।
दुष्यंत के किशोर मन में दो प्रकार के प्रश्न उठते थे जिनका उत्तर वे आज़ादी के बाद पाना चाहते थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि दूसरे विश्व युद्ध और आज़ादी के बाद सब कुछ अपना है, लेकिन आज़ादी के बाद साम्प्रदायिकता के विस्फोटक रूप हमारे सामने आए।
भष्ट्राचार के कई रूप पनपे। धर्म की हदबंदियों ने संबंधों को, आपसी भाईचारे को लगभग खंडहर के रूप में तब्दील कर दिया। भूख, ग़रीबी, बेकारी, बेबसी, अत्याचार, अंधेरगर्दी, निरक्षरता, अन्याय, असमानता हड़बोग आदि ने हमारी विकास-प्रक्रिया को भयावह और क्रूर रूप में बाधित किया।
दुष्यंत का संवेदनशील मन इन प्रश्नों से सीधे-सीधे बेचैन हो उठता था। अपनी काव्य-यात्रा की शुरुआत से लेकर अपने आकस्मिक अवसान के बीच उनकी कविता में कई तरह के स्वप्न, कई तरह के यथार्थ, कई तरह की स्थितियां और कई तरह के अन्तर्विरोध एक साथ मिलते हैं। 1950 में लिखा उनका एक गीत देखें -
"चाहे कितना कसकर बाँधों यह तूफान न बंदी होगा
उठा आ रहा दूर एशिया की घाटी से विप्लव का स्वर।
सोने-चांदी की दीवारें हो जाएंगी खण्डहर-खण्डहर
करते हो उपहास हमारा किस बूते पर किस बल पर
चमकीले सिक्कों के बंधन में ईमान न बंदी होगा।"
दुष्यंत की कविताओं और ग़ज़लों को पढ़ते हुए मुझे तीन तरह के स्वर सुनाई पड़ते हैं। एक स्वर स्वीकार का है जो बहुत शांत और मद्धिम है। दूसरा अस्वीकार का है जो बहुत उद्धत और व्यापक परिवर्तन का आकांक्षी है, जिसमें बेचैनी, नाराज़गी, असुरक्षा का भय, असमानता और अन्याय का प्रतिरोध है। तीसरा स्वर वह है जिसमें उन्होंने अपने प्रेम के लिए भी ‘स्पेस’ को बहुत शिद्दत के साथ तलाशा है।
इन समूचे स्वरों को दुष्यंत कुमार अपनी कविताओं में दर्ज करते हैं। सबसे ज़्यादा, प्रबल, शक्तिशाली और घनत्व वाला स्वर अस्वीकार और प्रतिरोध का ही है। इस अस्वीकार में वे नाराज़गी के उस मुकाम तक पहुँचते हैं, जिसमें जनकवियों के जनजागरण के अभियान हैं, जनपक्षधरता की चिंतायें भी। इसके साथ बौखलाहट भी है और चीख़ पुकार की आवाज़ भी शामिल है।
जनता जिसे पसंद करती है और वह जिस तरह का आचरण करती है और वह जिस तरह से अपने आक्रोश को व्यक्त करती है वह सबकुछ उसमें घुल मिल जाता है। दरअसल दुष्यंत की प्रसिद्धि का क्षेत्र इसी तरह की कविताओं से बनता है और यही उनकी पहचान का अटूट सिलसिला भी है। दुष्यंत कुमार के मित्रों, शुभचिंतकों और प्यार करने वालों ने भी उनके मूड्स या यूं कहें कि उनके उस पक्ष को सामने रखा है जो उनके तई उन्हें अच्छा लगा।
'यारों के यार दुष्यंत कुमार' में कथाकार शानी का दुष्यंत के बारे में कहते हैं, "संघर्ष यानी तथाकथित सफलता की लड़ाई जो उसके इस सबके बावजूद आख़िर तक नहीं मिली। हाँलांकि मैं जानता हूँ कि मिल भी जाती तो भी वह उसकी बेचैनी का इलाज नहीं थी। ...जल्दी, बेचैनी, खुलापन, बेलौस मस्ती, बेसब्री और अधैर्य से पैदा हुआ अंतरद्वंद्व, कविता ही नहीं उसकी ज़िंदगी का भी मिज़ाज था।"
दुष्यंत का एक गीत है जो उनके जज्बे को उनकी मनोसामाजिकी और उनके अटूट भरोसे के रूप में हम देख सकते हैं। इस गीत पर पाठकों और आलोचकों बार-बार निशाना साधते रहे हैं -
"ज़िंदगी ने कर लिया स्वीकार
अब तो पथ यही है।
अब उफनते ज्वार का आवेग मद्धम हो चला है,
एक हल्का-सा धुंधलका था कहीं कम हो चला है,
यह शिला पिघले न पिघले रास्ता नम हो चला है,
क्यों करूं आकाश की मनुहार
अब तो पथ यही है।
क्या भरोसा, कांच का घट है, किसी दिन फूट जाए,
एक मामूली कहानी है, अधूरी छूट जाए,
एक समझौता हुआ था रोशनी से टूट जाए,
आज हर नक्षत्र है अनुदार
अब तो पथ यही है।" (जलते हुये वन का बसंत)
कवि दुष्यंत की भयावह चिंताओं में हमारा समय रहा है, समय के तमाम घमासान, समय के कहे अनकहे द्वंद्व रहे हैं जिसके बारे में कहा जाता है, कि यह तलवार की धार जैसा समय है। इस समय में अन्याय, अत्याचार, शोषण, उत्पीड़न, दोगलापन है। धर्मान्धता, साम्प्रदायिकता, धूर्तता, छल-कपट और भ्रष्टाचार के अलावा राजनैतिक हडबोंग भी शामिल है।
इसे हम केवल राजनैतिक सत्ताओं में ही नहीं धर्मसत्ताओं, समाजसत्ताओं और अर्थसत्ताओं की व्यापक और बहुआयामी कार्यवाहियों में भी देख और अनुभव कर सकते हैं। इन सबकी शिनाख़्त भिन्न-भिन्न रूपों में दुष्यंत करते हैं -
‘‘कहां तो तय था चिराग़ा हरेक घर के लिए
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए।
हाथों में अंगारे लिये सोच रहा था,
कोई मुझे अंगारों की तासीर बताये।
दुष्यंत जनता के विश्वास को इस रूप में दर्ज़ करते हैं -
एक चिनगारी कहीं से ढूंढ लाओ दोस्तों,
इस दिये में तेल से भीगी हुई बाती तो है।
दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर
और कुछ हो या न हो, आकाश सी छाती तो है।
कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं,
गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं।
दुष्यंत के यहाँ प्रश्न हैं, प्रश्नांकनों के रेले हैं, अंतरद्वंद्वों के विराट रूपाकार हैं। जीवन के संघर्ष हैं, ताप हैं। उनकी कवितायें इन्हीं वास्तविकताओं में से अस्तित्व में आती हैं। कुंअर बेचैन के शब्दों में कहा जा सकता है कि "वास्तव में दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों में जो आग है वह उस व्यक्ति की आग है जो सामाजिक विसंगतियों एवं विद्रूपताओं को ध्यान से देखकर अपने समाज के बीच रहकर उसकी पीड़ा को पूरी तरह समझते हुये भीतर ही भीतर सुलग रहा है।’’
ख़ुद दुष्यंत का आत्मालोकन भी देखें जब वे कहते हैं, "मेरे पास कविताओं के मुखौटे नहीं है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रायें नहीं हैं और अजनबी शब्दों का लिबास नहीं है। मैं एक साधारण आदमी हूँ और इतिहास और सामाजिक स्थितियों के संदर्भ में साधारण आदमी की पीड़ा, उत्तेजना, दबाव, अभाव और उसके संबंधों के उलझनों को जीता और व्यक्त करता हूँ।" (जलते हुये वन का बसंत की भूमिका)
दुष्यंत के बारे में कई तरह से कहा जा चुका है। कई तरह से कहने का रिवाज़ उनकी ग़ज़लों के बारे में रहा है। सम्पूर्ण क्रांति के आविष्कर्ता जयप्रकाश नारायण के बारे में उनके शेर देखें -
‘‘एक बूढ़ा आदमी है मुल्क़ में या यों कहो-
इस अँधेरी कोठरी में एक रोशनदान है।
मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूँ।
हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है।
ऐसा नहीं है कि जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति पर सवालिया निशान नहीं खड़े हुए। आगे चल कर विरोधी ताक़तों ने अपना जाल फैलाया और देश में उसके गम्भीर परिणाम सामने आ रहे हैं। परस्पर विरोधी विचारधाराओं का कॉकटेल चलता रहा है। इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। इसके परिणाम भी सामान्य नहीं भयंकर है और इतने सवाल खड़े हुए कि 'जनतंत्र' सवालिया निशान को लगातार जी रहा है।
उन्होंने शेर कहे भी तो प्रतीकों और रूपकों में। कभी यथार्थ के दायरे में भी कभी व्यंग्य और विद्रूप में। ‘साये में धूप’ की ग़ज़लों में सत्ता प्रतिष्ठान और उस कालखण्ड में चल रहे घमासानों की पुरजोर प्रतिरोध की ही आवाज़ है। हालांकि कुछ ग़ज़लें उनके रोमेंटिक अंदाज़ को भी प्रस्तुत करती हैं। कुछ शेर पर नज़र डालें -
चाँदनी छत पर चल रही होगी,
अब अकेली टहल रही होगी।
फिर मेरा जिक्र आ गया होगा,
वों बरफ़ सी पिघल रही होगी।
तू किसी रेल सी गुज़रती है,
मैं किसी पुल-सा थरथराता हूँ।
तुमको निहारता हूँ, सुबह से ऋतंबरा,
अब शाम हो रही है मगर मन नहीं भरा।
अपनी ग़ज़लों में वे उस राजनीति के चरित्र पर प्रहार करते हैं जिसमें छल है, धोखा है, फ़रेब है, वादा ख़िलाफ़ी है, अंधेरगर्दी है। सच तो यह है कि अपनी ग़ज़लों में वे अच्छे खासे पैंतरे अपनाते हैं। कभी सीधे, कभी उलटे, कभी छाती ठोंककर जैसे -
"मत कहो आकाश में कुहरा घना है ,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है ।
इस सड़क पर इस कदर कीचड़ बिछी है
हर किसी का पांव घुटनों तक सना है।"
दुष्यंत में अफसोस की मुद्रायें हैं, अपनी स्थिति पर, अपनी बेचारगी पर और अपने अंतरद्वंद्वों के बारे में दुश्चिंतायें हैं। बदलते हुये संदर्भों में सामाजिक स्थितियों ने आदमी को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
यहाँ तो सिर्फ़ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं
खुदा जाने यहाँ पर किस तरह जलसा हुआ होगा।
रोज़ जब रात को बारह का गजर होता है
यातनाओं के अँधेरे में सफर होता है।
दुष्यंत की ग़ज़लों में मानवीय संवेदना के, हमारी टूटन और हताशा के हमारे अनुभवों की दुनियां के व्यापक रूपाकार हैं और संवेदनशीलता की अनेक तहें हैं। इन तहों में जीवन के हाहाकार दुख-दैन्य, निराशायें और पश्चाताप भी शामिल हैं। बानगी के तौर पर कुछ स्थितियां देखें -
यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियां
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा।
ये रोशनी है हक़ीक़त में एक छल लोगो,
कि जैसे जल में झलकता हुआ महल लोगो!
ये ज़ुबां हमसे सी नहीं जाती
ज़िंदगी है कि जी नहीं जाती।
बाढ़ की संभावनाएँ सामने हैं,
और नदियों के किनारें घर बनें हैं।
भारत में छठवें दशक के बाद गणतंत्र की विडम्बनाओं के कई रूप मिलते हैं। अविश्वसीनयता, काहिली, भ्रष्टाचार, कठहुज्जती, नौकरशाही, छल प्रपंच, धोखा। इनसे परेशान दुष्यंत कुमार ने कई ग़ज़लें लिखी हैं। उनमें से कुछ शेर यहाँ पेश हैं -
मरूस्थल आमेस होते है सियासत के क़दम,
तू न समझेगा सियासत, तू अगर इंसान है।
ख़ास सड़कें बंद हैं, तब से मरम्मत के लिये,
ये हमारे वक़्त की सबसे सही पहचान है।
इस तरह की ग़ज़लों में दुष्यंत ने अपना प्राण जैसा उड़ेल दिया है। अपनी तथा समाज की पीड़ाओं को एकाकर कर उन्हें सरेआम कर दिया है। उनके शब्दों का ताप और विश्वसनीयता हमें अपनी ओर खींचती है।
उनकी कविता का लोहा बजता है, उनकी कविता की आग बहती है और उसकी ऊष्मा हमें प्रभावित करती है। विजय बहादुर सिंह के शब्दों में, "सच तो यह है यह एक ऐसी कविता थी जो सच्चे और गहरे अर्थों में राजनीतिक थी और अपने समय की जनविरोधी राजनीति को नंगा कर रही थी।"
भारतीय जनतंत्र के हालातों पर, देश में हो रही गड़बड़ियों पर, छली जाती हुई जनता की वास्तविकताओं पर, कथनी और करनी के अंतर पर, देश में हो रहे छल-प्रपंचों पर दुष्यंत की चौकस निगाह रही है, इसलिए वे जिस तरह अनुभव करते हैं उसका बखान बिना किसी लाग लपेट के करते हैं। उनके रचनाकार को अपने इरादों को अभिव्यक्त करने में कोई हिचक नहीं हुई। उनकी यह ईमानदारी उन्हें कवियों की पंक्ति में अलग रूप से चिन्हित करती है।
दुष्यंत कुमार के असामयिक निधन के बाद भारतीय लोकतंत्र में तरह-तरह के रूप आये। आज़ादी और लोकतंत्र निरंतर परिपक्व हुये। आपात काल के दुःस्वप्न के बाद साम्प्रदायिकता, आतंकवादी गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं।
अभिव्यक्ति की आज़ादी को बाधित करने का षड़यंत्र रचा जा रहा है। हर सोचने समझने वाला, लिखने-पढ़ने वाला ऐतिहासिक विकास क्रम और वैज्ञानिकता को समझने वाला और कलात्मक दुनिया से जुड़े लोग अपने आप को असहाय और लाचार अनुभव कर रहे हैं।
प्रजातांत्रिक मूल्यों और आस्थाओं को जलील किया जा रहा है। देश की सांस्कृतिक धारायें सद्भाव और समन्वय की भावनाओं पर हमले प्रायः घटित होने वाले सच हैं। दुष्यंत की रचनात्मक कार्यवाहियाँ, उनके द्वारा किये गये हस्तक्षेप और प्रतिरोध अभी भी जनगण की बहुत बड़ी ताक़त हैं। घनघोर अँधेरे में रोशनी का फैलाव है। उनके तीन शेर यहाँ गौरतलब हैं -
कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं
गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं।
इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके जुर्म हैं
आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फ़रार।
मैं बेपनाह अँधेरों को सुबह कैसे कहूँ
मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं।
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6 रजनीगंधा, शिल्पी उपवन
श्रीयुत नगर, रीवा (म.प्र.) 486002
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