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यह चांद चुरा कर लाया है, सूरज से अपनी चांदनी - रामविलास शर्मा

हरि कर्की

Irshaad
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                                                  उन्नाव के उच्चगाँव सानी में 10 अक्तूबर, 1912 को जन्मे डॉ. रामविलास शर्मा आधुनिक हिन्दी साहित्य के सुप्रसिद्ध कवि, आलोचक एवं विचारक थे। डॉ. रामविलास शर्मा का साहित्यिक जीवन का आरंभ 1933 से हुआ जब वे सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' के संपर्क में आए। 1934 में उन्होंने ‘निराला’ पर एक आलोचनात्मक आलेख लिखा, जो उनका पहला आलोचनात्मक लेख था। यह आलेख उस समय की चर्चित पत्रिका ‘चाँद’ में प्रकाशित हुआ। उन्होंने लगभग 100 महत्वपूर्ण पुस्तकों का सृजन किया। 'रूप तरंग' तथा 'सदियो के सोये जाग उठे' आदि उनकी कविता संग्रह हैं। अज्ञेय द्वारा संपादित तारसप्तक (1943 ई०) के एक कवि के रूप में उनकी रचनाएं बहुत चर्चित हुईं।

प्रस्तुत है उनकी कविता- चांदनी

चांदी की झीनी चादर सी
फैली है वन पर चांदनी
चांदी का झूठा पानी है
यह माह पूस की चांदनी
खेतों पर ओस-भरा कुहरा
कुहरे पर भीगी चांदनी
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आँखों के बादल से आँसू
हँसती है उन पर चांदनी
दुख की दुनिया पर बुनती है
माया के सपने चांदनी
मीठी मुसकान बिछाती है
भीगी पलकों पर चांदनी

लोहे की हथकड़ियों-सा दुख
सपनों सी मीठी चांदनी
लोहे से दुख को काटे क्या
सपनों-सी मीठी चांदनी
यह चांद चुरा कर लाया है
सूरज से अपनी चांदनी

सूरज निकला अब चांद कहाँ
छिप गई लाज से चांदनी
दुख और कर्म का यह जीवन
वह चार दिनों की चांदनी
यह कर्म सूर्य की ज्योति अमर
वाह अंधकार की चांदनी

साभार - कविताकोश
5 वर्ष पहले
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