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तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किस का था

काव्य डेस्क

Irshaad
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                            -दाग़ देहलवी-
        
                                                    
                            

तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किस का था
न था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किस का था

वो क़त्ल कर के हर किसी से पूछते हैं
ये काम किस ने किया है ये काम किस का था

वफ़ा करेंगे, निबाहेंगे, बात मानेंगे
तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था

रहा न दिल में वो बेदर्द और दर्द रहा
मुक़ीम[1] कौन हुआ है मुक़ाम किस का था

न पूछ गछ थी किसी की वहां न आवभगत
तुम्हारी बज़्म[2] में कल एहितमाम किस का था

तमाम बज़्म जिसे सुन के रह गई मुश्ताक़[3]
कहो वो तज़्किरा-ए-ना-तमाम[4] किस का था

हमारे ख़त के तो पुर्जे किए पढ़ा भी नहीं
सुना जो तुम ने बा-दिल[5] वो पयाम[6] किस का था

गुज़र गया वो ज़माना कहें तो किस से कहें
ख़याल मेरे दिल को सुबह-ओ-शाम किस का था

अगरचे देखने वाले तेरे हज़ारों थे
तबाह हाल बहुत ज़ेरे-बाम[7] किसका था

हर इक से कहते हैं क्या 'दाग़' बेवफ़ा निकला
ये पूछे इन से कोई वो ग़ुलाम किस का था


1.रहनेवाला,निवासी 2.महफ़िल 3.उत्सुक 4.अधूरा ज़िक्र 5.दिल से 6.संदेश 7.छत के नीचे
9 वर्ष पहले
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