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अशोक चक्रधर: फावड़े ने मिट्टी काटने से इंकार कर दिया

काव्य डेस्क

Hasya
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                            फावड़े ने
        
                                                    
                            
मिट्टी काटने से इंकार कर दिया
और
बदरपुर पर जा बैठा
एक ओर

ऐसे में 
तसले की मिट्टी ढोना
कैसे गवारा होता ? 
काम छोड़ आ गया
फावड़े की बगल में।
धुरमुट की क़ंदमताल.....रुक गई,
कुदाल के इशारे पर
तत्काल,

झाल ज्यों ही कुढ़ती हुई
रोती बड़बड़ाती हुई
आ गिरी औंधे मुंह
रोड़ी के ऊपर।

आख़िर ये कब तक?
कब तक सहेंगे हम?
गुस्से में ऐंठी हुई 
काम छोड़ बैठ गईं
गुनिया और वसूली भी
ईंटों से पीठ टेक,
सिमट आया नापासूत
कन्नी के बराबर।

आख़िर ये कब तक?

-कब तक सहेंगे हम?
गारे में गिरी हुई बाल्टी तो
वहीं-की-वहीं 
खड़ी रह गई
ठगी-सी।

सब्बल
जो बालू में धंसी हुई खड़ी थी
कई बार
ज़ालिम ठेकेदार से लड़ी थी।

आख़िर ये कब तक?

कब तक सहेंगे हम?

-मामला ये अकेले
झाल का नहीं है
धुरमुट चाचा!
कुदाल का भी है
कन्नी का, वसूली का,
गुनिया का, सब्बल का
और नापासूत का भी है,
क्यों धुरमुट चाचा?
फवड़े ने ज़रा जोश में कहा।

और ठेक पड़ी हथेलियां
कसने लगीं-कसने लगीं
कसती गईं-कसती गईं।

एक साथ उठी आसमान में 
आसमान गूंज गया कांप उठा डरकर।

ठेकेदार भाग लिया टेलीफ़ोन करने।

-अशोक चक्रधर

साभार- कविता कोश
8 वर्ष पहले
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