बेशकीमती है आपका पुराना फोन, इसमें हैं सोना-चांदी और बहुत कुछ

बीबीसी
Mon, 21 Nov 2016 03:41 PM IST
your old phone is full off untapped precious metal

    गैजेट्स का इस्तेमाल करने का शौक आज ना सिर्फ नौजवान पीढ़ी को है, बल्कि हर उम्र के लोग इनका इस्तेमाल करते हैं। किसी को जरूरत है, तो किसी को इसकी लत।

    अगर मामला हो मोबाइल का तो फिर तो पूछिए ही मत। हरेक की यही कोशिश रहती है महंगे से महंगा मोबाइल फोन खरीद ले। पिछले कुछ सालों में आई- फोन का खुमार लोगों पर कुछ ज्यादा चढ़ा है। कंपनी ने मोबाइल का नया वर्जन बाजार में उतारा नहीं कि उसके खरीदारों की लाइन लग जाती है।

    मोबाइल को लेकर लड़कियों की पसंद और भी निराली है। उन्हें ऐसे मोबाइल अपने हाथ में रखना अच्छा लगता जो देखने में महंगा लगे, उस पर हीरे मोती जड़े हों तो कहने ही क्या। ऐसा मत सोचिए कि इस किस्म के मोबाइल बाजार में नहीं हैं। हर तरह का मोबाइल आपको मिल जाएगा। बस जरा जेब कुछ ज्यादा ढीली करनी होगी। जैसे हीरे जड़े आई-फोन की कीमत साढ़े नौ करोड़ डॉलर है।

    अगर आपकी जेब इतना महंगा फोन खरीदने की इजाजत नहीं देती, तो कोई बात नहीं। आपके पास कम कीमत वाला आई-फोन है तो भी आप अमीर हैं। क्योंकि हर आई-फोन में सोना, चांदी, कांसा, प्लेटिनम और पैलेडियम होता है। ये कीमती धातुएं आने वाले समय में और भी कीमती हो जाएंगी। जितना ज्यादा इन मोबाइल का उत्पादन हो रहा है, उतना ही इन धातुओं का इस्तेमाल भी हो रहा है। एक दिन ऐसा आएगा कि खदानों में ये धातुएं बचेंगी ही नहीं। अगर ऐसा हुआ तो आपका स्मार्टफोन तो कीमती से बेशकीमती हो जाएगा।

    एक आई-फोन में लगभग 0.034 ग्राम सोना होता है

    बेशकीमती है आपका पुराना फोन, इसमें हैं सोना-चांदी और बहुत कुछ

    एक स्मार्ट फोन इतना बड़ा होता है कि आपकी जेब में समा जाए। लेकिन इस छोटे से फोन में बहुत सी कीमती धातुएं होती हैं। मिसाल के लिए एक आई-फोन में लगभग 0.034 ग्राम सोना, 0.34 ग्राम चांदी, 0.015 ग्राम पैलेडियम, 15 ग्राम तांबा, और 25 ग्राम एल्युमिनियम होता है। यही नहीं, इन धातुओं के अलावा भी और बहुत सी ऐसी दुर्लभ धातुएं इस्तेमाल की जाती हैं, जिन्हें धरती से निकालने में भी काफी खर्च आता है। जैसे लेंटेनम, वाईट्रियम, टर्बियम, गैडोलिनियम वगैरह।

    इसके अलावा कांच, प्लास्टिक और ना जाने कितनी तरह की चीजे एक स्मार्टफोन बनाने में इस्तेमाल की जाती हैं। हालांकि ये सभी चीजें बहुत ही कम तादाद में इस्तेमाल होती हैं। लेकिन जितने बड़े पैमाने पर मोबाइल बनते हैं उस लिहाज से बड़ी मात्रा में ऐसी दुर्लभ धातुों का इस्तेमाल होता है।

    इस वक्त दुनिया में करीब दो अरब लोगों के पास स्मार्टफोन हैं। ये संख्या हर पल बढ़ती ही जा रही है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितने बड़े पैमाने पर इन धातुओं का इस्तेमाल हो रहा है। एक टन सोने के अयस्क से जितना सोना निकलता है, उससे तीन सौ गुना सोना, एक टन आई-फोन से निकाला जा सकता है। इसी तरह एक टन चांदी के अयस्क के मुकाबले इतने वजन के आई-फोन से साढ़े छह गुना से ज्यादा चांदी निकाली जा सकती है।

    लोग अपने कपड़ों की तरह मोबाइल बदलने लगे हैं। मोटे तौर पर दुनिया में लोग 11 महीने में मोबाइल बदल लेते हैं। क्योंकि इतने वक्त में बाजार में नए फीचर्स के साथ इतने फोन आ जाते हैं कि हर कोई उस नए फोन को खरीदना चाहता है।

    पुराना फोन फेंक दिया जाता है। वो कबाड़ बन चुका होता है। मुश्किल से दस फीसद मोबाइल से उनमें लगी कीमती धातुएं निकाली जाती हैं। या इन मोबाइल में लगे पुर्जों का फिर से इस्तेमाल किया जाता है। एक अंदाजे के मुताबिक दस लाख मोबाइल फोन से करीब 16 टन तांबा, 350 किलो चांदी, 34 किलो सोना और 15 किलो पैलेडियम निकाला जा सकता है।

    ई-कचरा आज सारी दुनिया के लिए एक चुनौती बना हुआ है। इस कचरे से खतरनाक केमिकल निकलते हैं, जो सेहत के लिए खतरनाक हैं। अमीर मुल्कों का ज्यादातर ई-कचरा भारत और चीन जैसे देशों को निर्यात कर दिया जाता है। जहां गरीब लोगों को इसे छांटने का रोजगार मिल जाता है। ये लोग इस कचरे से कीमती चीजें निकालने का काम करते हैं।

    दक्षिण चीन का शहर गुईयू दुनिया की सबसे बड़ी ई-कचरा मार्केट है

    बेशकीमती है आपका पुराना फोन, इसमें हैं सोना-चांदी और बहुत कुछ

    दक्षिण चीन का शहर गुईयू दुनिया की सबसे बड़ी ई-कचरा मार्केट है। यहां गरीब बच्चे और बेरोजगार लोग इस कचरे को तोड़ते हैं। कचरा गलाने के लिए कई बार खतरनाक केमिकल भी इस्तेमाल किये जाते हैं। इस कचरे से क्रोमियम, सीसा और पारे जैसी नुकसान पहुंचाने वाले मेटल निकलते हैं। जो ना सिर्फ सेहत के लिए खतरनाक हैं, बल्कि इससे आबो-हवा भी खराब होती है। नदियों का पानी प्रदूषित होता है।

    जो देश खुद अपने यहां इस कचरे को रिसाइकिल कर रहे हैं, उन्हें भी इस चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। मिसाल के तौर पर, ऑस्ट्रेलिया में इस कचरे को पिघलाया जाता है। ये काम बड़ी बड़ी फैक्ट्रियों में होता है। ये बड़े कारखाने कचरा पिघलाने के लिए मोटी रकम लेते हैं। धुआं निकलने से हवा दूषित होती है सो अलग।

    अब सवाल ये है कि इस मुसीबत से निजात कैसे मिले। सबसे पहले तो सभी लोग जल्दी-जल्दी फोन बदलने की आदत बदलें। लेकिन इतने भर से हालात नहीं सुधरेंगे। क्योंकि, आज उपभोक्ता की आदतें बदल गई हैं।

    ऑस्ट्रेलिया की न्यू साउथ वेल्स यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर वीना सहाजवाला कहती हैं कि हरेक इलाके में माइक्रो फैक्ट्री होनी चाहिए। जहां हिफाजत से ई-कचरे से कीमती चीजें निकाल ली जाएं। ताकि, उनका आगे इस्तेमाल हो सके और बाकी कचरे को जला दिया जाए। ये काम इंसान की जगह रोबोट या स्वचालित मशीनों से भी कराया जा सकता है। क्या पता अगर आप ऐसे मोबाइल तोड़ने का छोटा कारखाना लगा लें, तो कुछ सालों में आपके पास भी अच्छा खासा सोना और चांदी जमा हो जाएं।